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शांति और कविता

? कृष्णभूषण बल

 

बादलों को बुहारकर तारों को गोड़कर

निकाली गई चाँदनी जैसी कविता लिखूँ कहता था

खिड़की से नूर माँगकर कविता में वही नूर पोतूँ कहता था

 

हृदय में धड़कन उड़ेलकर

वैशाख जैसी सुंदर कविता लिखूँ कहता था

एकांत वन में पेङदोर्जे की फुदक जैसी कविता लिखने की आस लगाए था

कविता की तार में बिंब बाँधकर शब्दों के सुर में बजाना चाहता था

फूल की डोली में बिठाकर दुलहन जैसे कविता को व्याहना चाहता था

 

तोड़ न सका फूल को ड़ाली से

एक अदद उठाने पर पंखड़ी बनकर झड़ गई कविता

मलिन चेहरा लेकर भाव-विहीन पहाड़ के संग रोती हुई बैठ गई कविता

बारबार कविता के समीप जाने की कोशिश की तरंगमय शब्दों ने

 

त्रास में खो गई कविता,

जंगल में राँकेभूत बनकर खो गई कविता

मोहनी न बँधी कविता से, लाख मनाने पर भी

बदले में, छोटे मेमने की भाँति फुदककर ढलान में खो गई कविता

संभव है, शांति व कविता एक ही घोँसले के

दो चिड़ियों के नाम हैँ।

 

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पेङदोर्जे- एक पहाड़ी चिड़िया का नाम

राँकेभूत- रात को श्मसान और उसके आस-पास दिखाई देनेवाला प्रकाश-पुञ्ज जो चलता फिरता व गुम होता दिखाई देता है ।

 

मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी

 

वरिष्ट कवि श्री कृष्णभूषण बल का नाम आधुनिक नेपाली कविता-जगत में बहुत आदर और श्रद्धा के साथ लिया जाता है। उनकी एक काव्य-कृति भोलि बास्ने बिहान प्रकाशित है, जो सर्वाधिक लोकप्रिय है। उनकी कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद शीघ्र प्रकाशित होनेवाला है।