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कल ? हरिहर पौडेल
"कल आईए।" कल की तरह कल काम होने की आस लिए वह लौट पड़ा। दूसरे दिन- "देखिए, आज बहुत काम है, भीड़ भी ज्यादा है, कल थोड़ा जल्दी आईए आपका काम हो जाएगा।" वह फिर होटल लौट गया। वह गाँव से छोटी सी जेब लेकर आया था यह सोचकर की तुरंत लौट पड़ेगा। जेब हल्की हो रही थी। होटल का बिल बड़ रहा था। क्रम जारी था...। फिर आजिज़ हो वह एक वकिल के पास गया। अपनी दास्ताँ सुनाते हुए उसने अंत में कहा- "मैं इन सब 'कल कहनेवालों' के विरुद्ध अदालत में केस करूँगा।" वकिल बोला – "ठीक है, मैं केस तैयार करता हूँ। कल साथ जाकर दर्ज करेंगे।" अगले दिन मामला दर्ज हुआ और बहस की तारीख़ दे दी गई। बहस के दिन दोनों ओर से वकिलों ने वज़नदार तर्क और दलीलें प्रस्तुत किए। अंत में न्यायाधीश ने मामले की गंभीरता को मद्देनज़र करते हुए कहा – "आज की कार्रवाई यहीं मुल्तवी की जाती है। फ़ैसला कल सुनाया जाएगा।" कल होने से पहले वह गाँव लौट चुका था और फ़ैसला अकेले उसका इंतजार कर रहा था। ««« मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी |
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1967 में चितवन में जनमे श्री हरिहर पौडेल की तीन कृतियाँ प्रकाशित हैं। नारायणी वांगमय पुरस्कार से नवाजे गए श्री पौडेल बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से भौतिक-शास्त्र में पी.एच.डी. कर रहे हैं। |