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जब तुम बोलती हो ? मनु मन्जिल जब तुम बोलती हो मैं जीवन की सबसे गहरी आवाज सुनरहा होता हूँ। चाहे वर्षा हो चाहे आँधी आवाज संगीत के होंठ छूकर निकलती है जब तुम बोलती हो।
मेरे चाहत के छोर में फूल रहा एक फूल आकाश में लटकता एक तारा मेरे जीवन के क्षितिज को स्पर्श कर उड़ रहा एक पक्षी मन के तालाब में खेल रहा एक तरंग तुम ! जब बोलती हो।
पानी की लहर उठकर मरूस्थल के होंठ चूमती है जैसे मूरत जगाते हुए जीवन चूमता है मन उठता है और स्वर्ग के किनारों पर चलता है जब तुम बोलती हो।
लगता है, ईस संसार में तुम्हारे शब्द बचे रहें तो काफी है और जिंदगी गीत गुनगुनाते हुए इधरउधर करनेवाले रास्ते की एक मूरत हो जाए तो काफी है। सौंदर्य खुद को बटोरकर अपने घोंसले की तरफ चलता है जब तुम बोलती हो, मैं मरूस्थल, फिर बग़ीचा ओढ़कर सो जाता हूँ। ³³³ मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी |
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प्रतिभा पुरस्कार से सम्मानित कवि
श्री मनु मन्जिल की एक
काव्यकृति आँधीको आवेग
प्रकाशित है। वे नेपाली कविता जगत में विशिष्ट स्थान
बना चुके हैं। संपर्कः manumanjil@yahoo.com |