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मां के सपने

                                             ? गोपाल प्रसाद रिमाल

 

मां क्या वह आएगा ?

"हां बेटा वह जरूर आएगा,

वह सूबह का सूरज सा रोशनी बिखेरता आएगा

उसकी कमर में तुम एक शीत जैसा चमकता

एक हथियार देखोगे,

उसी से वह अधर्म से लड़ेगा !

जब वह आएगा, तुम उसे सपना मानकर

टटोलने लगोगे, पर वह हिम और आग से ज्यादा

तीखा होकर आएगा।"

सच्ची ? मां ?

"हां, जब तुम जनमे थे, तुम्हारे चेहरे में

उसी की छाया देखने की आस लगाए बैठी थी

तुम्हारी निश्चल हसीं में उसी की सुन्दर तसवीर,

तुम्हारी तुतलाती बोली में उसी की मधुर ध्वनि,

पर उस सुन्दर गीत ने तुम्हें

बाँसुरी नहीं बनाया।

मेरी जवानीभर का एक सपना था !

जो भी हो, वह आएगा,

मैं मां हूं, कह सकती हूं सारी सृजन शक्ति की ओर से

मैं कह सकती हूं,

वह आएगा,

यह कोई आलस्य का सपना नहीं है !

जब वह आएगा तुम ईस तरह

मेरी गोद में नहीं लेटोगे,

सच को तुम ऐसे सुनोगे

जैसे तुम चिपकते हुए चुंबक हो

तुम खुद ही उसे देख सकोगे, सह पाओगे,

और ग्रहण कर पाओगे,

तुम्हें ईस तरह धैर्य-दान करने के बदले तुम्हें संग्राम में जाते देख

लाख समझाने पर भी न माननेवाली मां को

खुद समझाते हुए तुम अलविदा कहोगे,

मुझे रोगी की तरह तुम्हारे बाल

सवारने नहीं होंगें,

देखोगे वह तूफान बनके आएगा

तुम पत्ते की तरह उसका पीछा करोगे

पहले जब वह जीवनलोक से गिर कर

चांद की तरह जमीं पर फैला था

सब जड़ता हिल गई थी, बेटे,

वह आएगा और तुम उठोगे ।"

क्या वह आएगा मां ?

मधुर उषासे उल्लसित पक्षियों के गीत जैसे

उसके आने की आस मेरे हृदयको गुदगुदा रही है मां !

"हां वह जरूर आएगा,

वह सूबह का सूरज सा रोशनी बिखेरता आएगा

अब मैं उठूंगी, चलूंगी।"

³

"पर बेटे,

मैं यही आस लगाए बैठी थी

की वह तुम ही हो,

मेरी जवानी भर का एक सपना था।"

 

 ³³³

मूल नेपाली से रूपान्तरः कुमुद अधिकारी।