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कर्नल का घोड़ा

? विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला

कर्नल मिसेज कर्नल को बहुत प्यार करते थे। ढलती उम्र में शादी कर लाई हुई जवान बीवी को कौन प्यार नहीं करता ? पर मिसेज कर्नल को 45 साल के कर्नल का प्यार काफी नहीं पड़ता था। मिसेज कर्नल 19 साल की थीं। जब भी कर्नल बाहर जाते थे बीवी को खुश करने के लिए कुछ न कुछ लाते रहते थे- जैसे साड़ी, पाउडर, लाली, चूड़ियां ईयरिंग आदि। पर उनका दिल कभी कर्नल की तरफ जा नहीं पाया। कर्नल जो सामान लाते थे बीवी को खुश करने के लिए उन सबसे एक कमरा भर गया था और मिसेज कर्नल उसी कमरे में बैठकर आंसू बहाती थीं। बहुत सी आशाएं और सपनों के साथन्होंने दूल्हे के घर में कदम रखा था। बहुत सुख की आशा कर बैठी थीं। वह ये सब याद करतीं और चुपकेचुपके आंसू बहातीं। शादी से पहले एक युवक ने उन्हें प्यार का न्यौता दिया था। सुन्दर था वह युवक, साथ ही स्वस्थ था और उसकी भुजाएं बलिष्ठ थीं। उसका बदन गठीला था। उसे याद करते ही उके बदन में अब भी झुरझुरी पैदा होती है। पर उस समय अपने दुल्हे की स्वर्णिम कल्पनाओं में डुबकर उन्होंने उसका न्योता ठुकरा दिया था। अब तो हर पल वही युवक याद आता रहता है, उसकी बलिष्ठ भुजाएं बहुत सताती हैं। उसकी बाहों की शक्ति को अनुभव करने की चाह सिर्फ मन में सिमटकर रह गई। वे चौंक कर कमरे की चारों तरफ देखने लगीं, कमरे के साजो सामान उसे चिड़ा रहे थे। खुद को खुश करने के लिए लाए गए वो सब सामानों से घिर कर वे कैदी बन गई थीं।

उसी वक्त खरीदे गए सामानों से लैस कर्नल भीतर ढुके।

"देखो मेरी जान ! क्या-क्या ले आया हूं ?" कर्नल ने सामान का ढेर उसके आगे रख दिया।

मिसेज कर्नल ने उत्साहहीन दृष्टि से एकबार कर्नल को और फिर सामानों को देखा।

"मैंने कितनी बार कहा है आपको- मुझे ये सब सामान नहीं चाहिए। बेकार में आप क्यों पैसे खर्च करते हैं ?" मिसेज कर्नल ने आंसू पोंछते हुए कहा।

कर्नल ने प्यार से कहा- "तुम क्यों सदा चिंतित रहती हो ? तुम्हारे तो अभी खाने पीने के दिन हैं। क्या तकलीफ है तुम्हें ? मुझे कहो तो सही।"

मिसेज कर्नल ने जबाव देना जरूरी नहीं समझा। वे समझते ही नहीं उसे क्या चाहिए। उन्नीस बरस की युवती के मन का भाव 45 सालका अधेड़ क्या समझेगा। कर्नल ने चुपचाप बैठी पत्‍नी को उठाया। वे  जो दुःखद बातें सोच रही थीं, सब भूल गईं। कर्नल के उमर को भूल कर उन्होंने अपना बदन उके ऊपर फैंक दिया। कर्नल उके भार को संभाल नहीं पाए और गिर गए। युवती के स्वप्‍नके सारे तार टूट गए। पत्‍नी को उठाने के प्रयास में  फर्स पर पड़ गए थे कर्नल। सांस फूलकर दोहरे हो रहे कर्नल को एकबार घृणा की दृष्टि से देखा उन्होंने। उसके बाद मिसेज कर्नल के दिल में कर्नल के प्रति महान तिरस्कार के भाव उत्पन्न हुए।

एक दिन कर्नल और मिसेज कर्नल अपने कंपाउंड का निरीक्षण कर रहे थे। कर्नल ने विदेशों से मगाकर पांच गायें पाल रखे थे। गोठ में वे बहुत देर तक गाय और दूसरे मवेशियों का निरीक्षण करते रहे। गोठ से लगा हुआ एक तबेला था। घोड़े की हिनहिनाहट सुनकर मिसेज कर्नल ने कहा- "आपने घोड़े भी पाल रखे हैं ? मुझे मालूम न था।"

कर्नल ने बहुत चाहत से यह सफेद घोड़ा खरीदा था। वे खुद दैनिक घोड़े को चारा-पानी खिलाते थे, मालिश करवाते थे और सबेरे घोड़े पर सवार हो टहलने के लिए निकलते थे। फिर कुछ समय से वे दूसरे कामों में उलझ गए थे और घोड़े की तरफ ध्यान नहीं दे पाए थे। घुड़सवारी किए भी कुछ दिन हो गए थे।

"चलो ! चलकर उसे देख आएं।"

स्वामी को देखकर घोड़ा आगे के पैर पटकते हुए और जोर से हिनहिनाले लगा। चूंकी घोड़ा अंधेरे में बंधा हुआ ता उसकी आंखे बिल्ली की तरह चमक रही थीं। हिनहिनाते व़क्त उसके नथुने फूल जाते थे। पैर में नसें इस तरह फैली हुई थीं।की लगता पैर में सांप ने कुण्डली मारा है। मिसेज कर्नल को घोड़ा आकर्षक लगा, जब उसे छुने लगीं तो घोड़े ने छुने न दिया और गर्दन हिलाकर ऐसा करने लगा मानों काटने जा रहा हो। घोड़े के इस स्वभाव से मिसेज कर्नल डरी नहीं पर घोड़े ने उका और मोह लिया।

"कितना बलवान घोड़ा है। शायद इसकी देखभाल अच्छी नहीं होती होगी ?" वह कह गईं।

"पहलेपहले तो मैं इसका खूब देखभाल करता, पर आजकल सब सईस के जिम्मे है। वही इसकी देखभाल करता है। मैं आखिर कितनी तरफ नजर दौड़ाऊं ?"

मिसेज कर्नल ने कहा-"अब मैं इसकी जिम्मेदारी लेती हूं। सईसका क्या भरोसा ? समय पर चारा दे या न दे ? फिर सुना है सईस तो चारा चुराकर बेच भी लेते हैं। जब खुद पाला है तो खुद देखभाल करना जरूरी भी है।"

कर्नल मुस्कुराए पर बोले कुछ नहीं। दूसरे दिन से मिसेज कर्नल घोड़े को चारा देने लगी। शुरूवाती दिनों में तो घोड़ा उन्हें पास फटकने नहीं देता था, पर मिसेज कर्नल ने बड़े प्यार से घोड़े के स्वभाव पर काबू पा लिया। जब घोड़ा चारा खा रहा होता तो मिसेज कर्नल उसके पास जाकर पीठ सहलाती। घोड़े के बदन में उके हाथ पड़ते ही घोड़े का शरीर कांप उठता। घोड़ा मुह उठाकर कुछ देर तक उन्हें देखता, हिनहिनाता और फिर चारे में मुंह जोतकर खाने में मशग़ूल हो जाता। कभी कभी घोड़ा पैर पटकता तो अस्तबल की निस्तब्धता भंग होती और मिसेज कर्नल को पता चलता की घोड़े को मख्खियां परेशान कर रही हैं। उन्हें अब गहरा संतोष होने लगा था क्योंकि घोड़े की देखभाल अच्छी तरह से हो रही थी।

कर्नल को यह बात पसंद नहीं थी कि उनकी दुलहन सदा घोड़े का ही देखभाल करती रहे। दिन में एक दो बार देखना अलग बात है, पर दिनभर अस्तबल में ही पड़ी रहना उनकी नजर में मुनासिब नहीं था। सईस के रहते क्यों खूद चारा डालने चली जाए, क्यों घोड़े की मालिश खुद करे ?

एक दिन कर्नल ने मिसेज कर्नल को कहा- "मिसेज कर्नल, तुम क्यों घोड़े की स कदर फ़िक्र करती हो ? अपने रसोई में क्या पका है, तुम्हें सुध नहीं रहती पर घोड़े की इतनी सुश्रूषा ?"

"मैं कोई ठकुराइन या महाराजिन तो नहीं जो रसोई में जुती रहूं ? मुझे जो अच्छा लगता है वही करूंगी। घोड़े की देखभाल से मुझे शांति मिलती है, सुकून मिलता है, यह भी आपको बरदास्त नही हो रहा है ?"

"तुम्हें किस बात का ग़म है जो मुझे ये सब सुना रही हो ? तुम्हारे मन में कौन सी अशांति है जो तुम्हें घोड़े की देखभाल से शांति मिलती है ? मेरे प्रति भी तो तुम्हारे कुछ जिम्मेदारियां हैं। घोड़े को जितना तबज्जुह देती हो, उतना मेरे लिए सोचा है कभी ? सच कहूं तो तुम्हारे व्यवहार से तो मुझे उस घोड़े से ही ईर्ष्या होने लगी है मिसेज कर्नल  !" रूवांसे होकर कर्नल ने कहा।

मिसेज कर्नल ने कुछ नहीं कहा, सिर्फ घृणा से होठों को सिकुड़कर कर्नल को एकबार देखा। उस अधेड़ उमर में भी कर्नल की  आंखों में आंसू उन्हें फुटी आंख नहीं भाई और उन्हें घृणास्पद भी लगा। लगा कर्नल की उपेक्षा कर और घृणा का परिचय दिया जाए परन्होंने वैसा नहीं किया और उठकर वहां से चल दी

एक दिन कर्नल और मिसेज कर्नल तबेले में गए। कर्नल ने घुड़सवारी की इच्छा जाहिर की। वे जब घोड़े के पास जाते घोड़ा उन्हें काट खाने को तत्पर रहता। पर जब मिसेज कर्नल पास जातीं तो हिनहिना उठता। मिसेज कर्नल पास जाकर घोड़े को सहलाने लगी। घोड़े ने हिनहिनाकर और पैर ठोककर कृतज्ञता जाहिर किया।

बहुत मुश्किल से कर्नल घोड़े पर चढ़ सके लेकिन उसे काबू नहीं कर सके। घोड़ा आगे के दो पैर उठाकर फूंकार उठा और उसने आगे बढ़ने से इंकार कर दिया। कर्नल घुड़ सवारी में निपुण थे इसलिए गिरे नहीं पर वे अचानक गुस्से से पागल हो गए और कोड़े से घोड़े को बेतहाशा पीटने लगे। घोड़े के पीठ में पहला कोड़ा क्या पड़ा था मिसेज कर्नल चिल्ला उठीं- "निर्दयी !" पर घोड़ा कोड़े की चोट से भी नहीं बिदका और अपने स्थान में जमा रहा। कर्नल आंखें मूंदकर उसपर कोड़े बरसा रहे थे। घोड़े ने पिछले पैरों को उछाला। कर्नल घोड़े को पीटने को व्यस्त थे और लगाम की तरफ उनका ध्यान नहीं था। वे औंधे मुह जमीं पर गिर गए। तबतक मिसेज कर्नल घोड़े के पास पहुंच चुकी थी। धूल से सने कर्नल की तरफ ध्यान न देकर वे घोड़े को सहलाने लगी।  घोड़े के नथुने क्रोध से फुल रहे थे और उनसे भाप निकल रहा था। घोड़ा बिजयी हो गया था, शत्रु पराजित होकर गिर गया था। घोड़े की शक्ति को लेकर मिसेज कर्नल को कोई शक नहीं था। घोड़ा उके लिए गर्व का विषय था। प्यार से उन्होंने अपने गाल घोड़े की गर्दन पर टिका दिया।  उन्हें भी घुड़सवारी की इच्छा हुई और वे रकाब में पैर रख घोड़े पर सवार हो गईं। कर्नल जमीं पर लेटे थे और वह घोड़े पर चढ़कर अपार सुख का अनुभव कर रही थी। आज उसे कर्नल से बदला लेने का मौका मिल गया था। घोड़े के प्रति उसका प्यार और बड़ा और  फर्श पर धूल चाट रहे कर्नल को तिरछी नजर से देखकर  उन्होंने एड़ी दबाई।  घोड़ा ऐसे चल पड़ा मानो फूल का भार ढो रहा हो।

जब वे घुड़सवारी से लौटकर आईं तो कर्नल खड़े थे। उनके कोट में अभी भी धूल पड़ी थी, बाल बिखरे थे। गिरा हुआ टोपी धूल में ही पड़ा हुआ था। कर्नल के पास घोड़े को खड़ा कर मिसेज कर्नल घोड़े से उतर गईं। और कृतज्ञता जाहिर करते हुए घोड़े की पीठ को ठोंका। घोड़ा तिखी आवाज के साथ हिनहिनाया। मिसेज कर्नल को ऐसे महान सुख की अनुभूति कभी नहीं हुई थी। उसी व़क्त डांय-डांय पिस्तौल के दो शब्द निकले। घोड़ा कुछ देर लहराया और फर्श पर ढेर हो गया। कर्नल के हाथ में पिस्तौल था और उसके नल से अभी भी धूवां निकल रहा था। घोड़े के पेट से खून की नदी बह रही थी।  मिसेज कर्नल ने एकबार घोडे की तरफ देखा और फिर कर्नल की तरफ। देखते देखते उसका चेहरा बिकृत हो गया और दोनों हाथों से मुंह ढककर वह वहीं फर्श पर लुढ़क गई। 

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मूल नेपाली से रूपांतरः कुमुद अधिकारी