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छापामार का बेटा

? महेश विक्रम शाह

वह छापामार का लड़का है।

मैं अपने ऑफिस के कुरसी में बैठकर खिड़की से बाहर उसे देख रहा हूं।

वह आंगन में इधर-उधर खेल रहा है। मैं उसके हर गतिविधि को एकाग्र होकर देख रहा हूं। मेरे ऑफिस के सामने दो कमरे का एक मकान है, जो पत्थरों से बना है। एक कमरे के दरवाजे पर ताला लटक रहा है और एक सिपाही राइफल लिए चौकन्ना पहरा दे रहा है। उसी कमरे की खिड़की की रॉड पकड़े एक औरत टकटकी लगाए उसी बालक को निहार रही है। वह उस लड़के की मां है। हम दोनों के दृष्टि से बेखबर बच्चा खेल रहा है और हम उसी को देख रहे हैं। कभी कभार हम दोनों की आँखें एक दूसरे से मिलती हैं। भाव-विहीन उसका चेहरा और भी गति-विहीन हो जाता है, ऐसा ही महसूस करता हूँ मैं।

वह लड़का उछलकूद तो कर ही रहा है, साथ ही हंसहंस कर आंगन का चक्कर भी काट रहा है। वह शायद अपने घर के आंगन और ईस आंगन के फर्क से अन्जान हो। यहां तो उसकी मां पिंजड़े में है। ईस छापामार के लड़के के निडर, निश्चल, और निश्चिन्त क्रियाकलापों से मैं भीतर ही भीतर सुलग रहा हूं। क्या यह लड़का ईस आंगन को अपने छापामार बाप की जागिर समझता है? मेरे चेहरे में क्रूरता के भाव उग आए हैं। ईस तरह छापामार के बेटे का सुरक्षा फौज के कमांडर के सामने निश्चिन्त बाललीला का प्रदर्शन करना, उसके बापद्वारा राईफल से आक्रमण करने के समान ही लग रहा है मुझे। छापामार की बीवी की तरफ देखता हूं जिसकी आंखें पहले की ही तरह अपने बेटे को ढूंढ़ रही हैं। अपनी सुरक्षा से ज्यादा अपने बेटे की सुरक्षा के प्रति चौकन्नी है वह।

पर वह लड़का निश्चिन्त आंगन में उछलकूद कर रहा है। ऐसे में मैं सोचता हूं- ईसका बाप छापामार दस्ते का प्लाटून कमांडर रक्तबीज ईस वक्त क्या कर रहा होगा। उसे अपनी बीवी और बेटे का सुरक्षा फौज के कब्जे में होना मालूम पड़ गया होगा। उसका गरम खून और खौल उठा होगा, उसके कड़े हाथ रायफल का बट झट पकड़ते होंगे। और फिर रायफल को आकाश की तरफ कर गोली दागता होगा.. ढांय...ढांय....ढांय....। अपनी बीवी और बेटे के ऊपर मड़राती संभावित खतरे को भांप, वह उत्तेजित हो बड़बड़ता होगा।

मैं वहां बैठकर छापामार के संभावित शारीरिक और मानसिक स्थिति की कल्पना में डूबते हुए उसके बेटे के चेहरे में उसकी क्रूरता ढूंढ रहा था। पर मेरे पांच वर्षिय बेटे और उस लड़के की निश्चलता में मैं फर्क नहीं ढूंढ पा रहा था। फिर भी उस छापामार के लड़के के चेहरे में हिंसात्मक प्रवृत्ति के कुछ न कुछ तो लक्षण जरूर होंगे, ऐसी ही अपेक्षा में मैं सोचता रहा था- यह आखिर वही छापामार का लड़का है, जिसके हाथों से मेरे बहुत से सिपाही अपनी जान गवां चुके हैं, कितनी ही बहुएं बेवा बन गई हैं, सैकड़ों बच्चे अनाथ हो चुके हैं जिनका भविष्य अन्धकार है। मैं ईस यथार्थ को याद कर आश्चर्यचकित होता हूं की यह वही बाप का लड़का है, जो ताजे खून की नदियों में डूबी हुई लाशों को देखकर अट्टहास करता हो। सरकारी बर्दी को फूटी आंख न देखने वाले और किसी भी सिपाही को जीवित देखना न चाहनेवालों में से है ईस लड़के का बाप।

गर्मी के भाप से भर गया है मेरा कमरा। मैं पसिने से सर्वांग भीग जाता हूं। उस लड़के की निडरता और हमारे नियन्त्रण के प्रति उसकी बेपरवाही को मैं चैलेंज मानने लगा हूं। शायद उसका बाप अपने बेटे के माध्यम से हमें हांक दे रहा हो।

मैं खिड़की के बाहर उस लड़के को देखता हूं। मेरी आँखों में अभी क्रूरता उभर आई है। उसके छापामार बापद्वारा दी हुई मानसिक पीड़ा से उभर आई क्रुरता। उसके बालक के शरीर में मैं अपनी दृष्टि बोता हूं, यह सोचते हुए की ईसके बाप को यदि मैं ईस समय मिलूं तो ऐसा व्यवहार करेगा मानो कोई भूखा भेड़िया अपने शिकार हिरण को मार गिराने उसके पिछे दौड़ा चला आ रहा हो। और यही लड़का भी तो अपने बाप के पद चिन्हों पर चलते हुए हमारे शर काटने को किंचित् पीछे नहीं हटेगा।

मेरी दृष्टिमें क्रूरता देखकर उसकी मां अपनी कोठरी के भीतर बेचैन होने लगी है। उसका मलिन चेहरा आतंकित बन गया है। मैं देख रहा हूं, वह ध्यान से मेरे शारीरिक हावभाव को देख रही है।

मेरी दृष्टि को भांप कर गार्ड धनबहादुर मेरे पास आ गया है। पैर पटकाकर सलाम ठोंकते हुए मेरा ध्यान अपनी ओर खींचना चाहता है- "सर, यह छापामार का लड़का तो बड़ा उद्दंड निकला।"

"हां !" मैं प्रश्नवाचक दृष्टि से उसकी ओर देखता हूं।

उसी लड़के की तरफ आँख लगाए वह कहता है "सर ! यह भी अपने बाप के सभी करामत जानता है। जमीं पे कैसे क्रॉलिं की जाति है, और गोली की आवाज सुनने पर कैसे छिप जाना है, सब कमाल कर के दिखा दिया। अब यह गांव लौट गया तो जरूर छापामार बनेगा, सर !"

"हां !" मेरी आवाज में आश्चर्यमिश्रित निरीहता के भाव आने लगे हैं।

उस लड़के के मासूम चेहरे में मैं उसके बाप की क्रूरता ढूंढ़ता हूं और यह सिपाही उसी चेहरे में वयस्क छापामार ढूंढ़ता है। हां हम दोनों की दृष्टि जो अलग है। मैं बीते हुए कल की सोच रहा हूं और वह भविष्य की डींग हांकता है। पर यह बात भी उतनी ही सही है की मैं और वह सिपाही उस लड़के की उपस्थिति से मानसिक रूप से संत्रस्त हैं, त्रशित हैं। यही हम दोनों की अनुभूति है।

मैं आंगन में खड़ा हूं। अब मेरे सामने वही लड़का सशरीर उपस्थित है। मैं सूक्ष्म दृष्टि से उसे शर से पैर तक देखता हूं। उसका गोल सा चेहरा और शर बाकी अंगो से ज्यादा विकसित लगते हैं। उसके हाथ-पैर भी मजबूत दिखते हैं। वह एक मैला सा हाफ़ बुसर्ट और एक दो तरफ पैबन्द लगी हुई चढ्ढी पहने हुए है। उसके पैर नंगे हैं पर बलिष्ठ हैं, घुटनों और कोहनीयों की चमड़ी खूरखूरी बन गई है।

मैंने उसकी आंखों में झांककर देखा। वह भी बालसुलभ चंचलता से मेरी आंखों में झांकने लगा और थोड़ी देर बाद खिलखिलाकर हंस पड़ा। उसकी अबोध हंसी में उसके छापामार बाप का अट्टहास कतई कल्पना नहीं कर पाया मैं। वह खिलखिलाता रहा और उसकी खिलखिलाहट में मैंने अपने बेटे की हंसती हुई तसवीर देखी।

मैंने उसके गाल थपथपाए और उसके छोटे-छोटे हाथ पकड़ते हुए कहा- "बेटे, तुम्हें यहां डर नहीं लग रहा ?" उसने शर हिलाकर नहीं कहा। वह मेरे कमर में लटके हुए पिस्तौल को ध्यान से देख रहा था। फिर अचानक उसके हाथ ऊपर उठे और मेरे पिस्तौल की तरफ इशारा करते हुए उसने कहा- "मेरे पिताजी के पास भी है।"

"और क्या-क्या हैं, तुम्हारे पिताजी के पास ?" मेरे सवाल से एकपल तो वह नाजवाब रहा फिर मेरे गार्ड का रायफल दिखाते हुए बोलने लगा- "वह भी है।"

"तुमने पिताजी से और क्या सिखा है, बेटा ?"

"बहुत कुछ। सब मालूम है। बताऊँ ? दुश्मन के आने पर कैसे छिपना है, कैसे उन्हें मारना है, सबकुछ सिखाया है। दिखाऊँ क्या ?" ऐसा कहते हुए वह जमीं पर लोट गया और फिर कोहनी के बल अपने बदन को आगे सरकाने लगा। थोड़ी सी दूरी पार करने के बाद उसने पैंतरा बदला और एक पैर को मोड़कर दूसरा सीधा रखते हुए सरकने लगा। कुछ दूर पहुंचकर जोर से दौड़ा और पत्थर के दिवार आड लिए एक तरफ छुप गया। अचानक उसने हमारी तरफ एक पत्थर फेंका और चिल्लाया- "धडाम..!"

"विस्फोट ! दुश्मन मर गए।" फिर उसकी खिलखिलाहट गुंजी। मैंने उसकी हंसी में विभत्सता देखी। मेरे रोंगटे खड़े हो गए। शरीर ठंडा पड़ गया। यह छापामार का लड़का हमारे सामने निर्भय और निसंक छापामार युद्ध के कौशल प्रदर्शित कर रहा था।

उसकी मां को अपने बेटे की कारनामी पसंद नहीं आ रही थी। उसने वहीं से आवाज लगाई "जल्दी यहां आओ।"

उस लड़के से छोटी मुलाकात के बाद मैं अपने कमरे में आ गया हूं। सोचने लगा हूं कि ईस औरत और उसके बेटे को कौन से कानून के तहत कार्रवाई करूँ ? कानूनन बच्चे को मैं कुछ नहीं कर सकता था पर उसकी मां को कड़ी से कड़ी सजा कानूनन दी जा सकती थी। भले ही वह सीधे छापामार युद्ध में शामिल नहीं थी पर हथियार बगैरह जमा करने और मुखबिरी करने के काफी प्रमाण जुट चुके थे। उसे सीधे जेल भेजा जा सकता था।

वह उस कमरे में अपने बेटे को गोद में लिए शर में हाथ फिरा रही है। उसकी आवाज भी मेरे कानों तक पहुंच रही है, लेकिन वह क्या कह रही है, मैं यकिनन नहीं कह सकता। वह अपने बेटे से स्थानीय भाषा में बातें कर रही है। उसकी आंखों से बेटे के लिए ढेर सारा प्यार उमड़ पड़ा है। बच्चा भी मां के प्यार से अभिभूत हो रहा है। घर त्यागकर जंगल जा चुकी मां को अभी अपने बेटे की सुरक्षा चिंता खाए जा रही है। उसका चेहरे में वही भाव हैं। अपने छापामार पति की वंश रक्षा के लिए वह औरत व्याकुल व अधीर है। बेटे को गोद में लिए अपनी आंखें बार-बार उठाकर मेरी तरफ देखती है। शायद सोच रही हो 'यह यहां का कमांडर होगा, और न जाने कैसी सजा मुकर्रर करेगा, मेरे और मेरे बेटे के लिए। भविष्य में क्या होगा मेरे बच्चे ?'

अचानक आंगन में साइकिल की घंटी बजाते हुए मेरा छोटा बेटा आया है। और साइकिल चलाते हुए आंगन के चक्कर मार रहा है। मैं देख रहा हूं, उस कोठरी में कुछ हलचल हुई है। छामामार का लड़का मां की गोद छोड़कर खिड़की का रॉड पकड़े साइकिल पर सवार मेरे बेटे को देख रहा है। शायद साइकिल की घंटी का ट्रिं..ट्रिं.. और घुमते हुए पहिए उसके बाल मन को झंकृत कर रहे हों।

मां की गोद को त्याग कर वह लड़का बाहर आ गया है। आंगन के कोने में बैठकर टकटकी बांधे वह आश्चर्य से मेरे बेटे को साइकिल चलाते हुए देख रहा है। पहिये के गति के साथ उसके चेहरे में भावनाओं की उथल-पुथल जारी है। मैं उसके चेहरे के रंगों की परिवर्तन से उसकी मानसिक स्थिति पढ़ने की कोशिश कर रहा हूं। मुझे लगता है की उसे साइकिल की सवारी करने की तीब्र ईच्छा जाग उठी है, और इसी वजह से उसकी मांसपेशियां ऊपर-नीचे हो रही हैं।

फिर मैं देखता हूं अचानक वह लड़का मेरे बेटे की साइकिल की तरफ दौडा़ जा रहा है। वह अपने हाथ फैलाकर साइकिल पकड़ने की कोशिश करता है पर साइकिल की गति से तालमेल नहीं बैठा पाता। साइकिल तो छुट ही जाती है, वह वहीं गिर पड़ता है। वह लेटे-लेटे ही सरककर साइकिल के पहिए को पकड़ने की कोशिश करता है। पहिए को पकड़ तो नहीं पाता शायद पहिए से उसके हाथ में घाव लग गया है। इसलिए वह दहाड़े मारकर रोने लग गया है। पर उसके दहाड़ में घाव से ज्यादा साइकिल पकड़ न पाने की हीनता ज्यादा है। मैं चुपचाप ईस युद्ध के दृश्य देखकर यह सोचने लगता हूं की यह मेरे और छापामार के बेटे की लड़ाई न होकर मेरे और उसके बीच की वास्तविक लड़ाई है। लगता है हम दोनों साइकिल के लिए युद्ध कर रहे हैं। ईसी लड़ाई में साइकिल के दो पहिए अलग होकर दो तरफ पड़े हैं। साइकिल पूर्ण रूपसे बिगड़ गया है, विकृत बन गया है। पर हम दोनों उसी विकृत साइकिल के पहिए से एक दूसरे पर क्रूर प्रहार कर रहे हैं।

"यह मेरी साइकिल है।" मेरा बेटा चिल्ला रहा है। छापामार का बेटा भी कुछ कम नहीं है- "यह साइकिल मैं चलाऊंगा।" मैं चौंक उठता हूं। अभीअभी मैं जो सोच रहा था, वही बात घटने जारही है शायद मेरे बेटे और उस लड़के के बीच। मैं थोड़ा गंभीर बन जाता हूं। जोर से पुकारता हूं अपने बेटे को- "अपने दोस्त को भी साइकिल चलाने दो बेटा ! तुम लोग लड़ाई मत करो।"  

अब वही साइकिल पहले की तरह ही आंगन में चलाई जा रही है। पर उसे चलाने में मेरे बेटे के साथसाथ छापामार का लड़का भी शामिल है।  मेरा बेटा उसे साइकिल चलाना सिखा रहा है। शायद तीन पहियोंवाली साइकिल उसे कुछ आसान लगी है, वह पेडल में पैर रखना जान गया है। वह सिट में बैठा है और मेरा बेटा कैरियर में बैठकर उसे बता रहा है- "जल्दी-जल्दी चलाओ तो।.. तब न चलेगी।"

आंगन छोटा है फिर भी दोनों मजे से साइकिल चला रहे हैं। चक्कर मार रहे हैं। छापामार का लड़का साइकिल की सीट में बैठ खिलखिला रहा है और मेरा बेटा कैरियर से उसकी पीठ थपथपाते हुए उछलकूद कर रहा है।

उस लड़के के चेहरे से कुछ देर पहले की ईर्ष्या, जलन और हीनता जैसे सभी भाव गायब हो गए हैं। मेरे बेटे की निर्मल चेहरे की तरह उसके चेहरे में भी अपना प्यार देखने लगा हूं मैं।

छापामार के बेटे को उस तरह से साइकिल चलाते हुए देख मैं सोचने को विवश हो जाता हूं। ईसी तरह यह लड़का कुछ दिन और साइकिल चलाए तो अपने बाप से सीखे हुए सब युद्ध कौशल भूल जाएगा। वह भूल जाएगा पेट के बल सरक कर, आड लेकर, निहत्थे लोगों पर बम फैंककर 'मर गया-मर गया' चिल्लाने का नाटक करना। वह भूल जाएगा, बालचरित्र के खिलाफ उसे सिखाई हुई बातें। मैं अब महसूस कर पाया हूं, वह जो हरकतें कर रहा था, वह अपने बाप से जन्मजात लेकर नहीं आया था। वो तो वो हरकतें थीं जो ईस दिग्भ्रमित समय और विकृत परस्थिति की उपज थीं।

मैं उस कमरे की तरफ देखता हूं। छापामार की बीवी अपने बेटे को देखकर मुस्करा रही है। बहुत दिनों के बाद मैंने उसके चेहरे में खुसियां देखी है। अपने बेटे को खुस देख शायद उसके चेहरे में भी खुसियां उभर आई हों।

बहुत दिन सोचने के बाद मैं ईस निर्णय पर पहुंचता हूं की, छापामार रक्तबीज की अपराध की सजा उसकी बीवी और मासूम बच्चे को देना उचित नहीं है, बल्कि उन्हें सजा देना मानवता के विरूद्ध भी होगा। उसके अलावा छापामार के बेटे को मैं प्यार करने लग हूं। ईसी आत्मवोध से प्रेरित हो मैं उन्हें सुरक्षित गांव पहुचाने का निर्णय लेता हूं।

उन्हें गांव गए तीन दिन बाद ख़बर आती है की दूसरे दिन ही छापामार कमांडर रक्तबीज आकर अपने बीवी और बच्चे को लेकर फिर जंगल में घुस गया है। ईस ख़बर से मैं मर्माहत हो जाता हूं। ऐसा महसूस होता है की दिल फट गया है।

मुझे ईस बात से ज्यादा पीडा़ पहुंची है की हम उस छापामार के लड़के को भविष्य में छापामार बनने से रोक नहीं पाए। 

³³³

नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी


1965 में अछाम जिले में जनमे श्री महेश विक्रम शाह की कथा साहित्य की चार कृतियां प्रकाशित हैं- सटाहा, सिपाहीकी स्वास्नी, अफ्रिकन अमिगो और छापामारको छोरो। उन्हें छापामारको छोरो के लिए, संवत् २०६३ का मदन पुरस्कार मिला है। वे नेपाल पुलिस में डी.एस.पी. के पद पर कार्यरत हैं।