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प्रीति

--परशु प्रधान

तुम आई दरवाजे पर और कॉलबेल बजाने लगी। मैंने लगातार बजते हुए कॉलबेल को सुना पर दरवाजा खोलने का मन नहीं हुआ। कॉलबेल लगातार बजती रही और मैं उसका आनंद लेता रहा। कान्छो दूध लेने गया है शायद नहीं तो वही दरवाजा खोतला। पर तुम कॉलबेल बजाती रही। मैंने सोचा - कैसी गवांर लड़की है, इतने सबेरे क्यों यहां आई है ? अभी तो सिर्फ आठ बजे हैं। नौकरी के लिए मुझे चापलूसी करने की जल्दी है उसे। बेमन से उठा मैं। नीचे उतरकर दरवाजा खोला। तुम वहां खड़ी थी। मैं देखता ही रह गया। तुम इतनी सुन्दर होगी मैंने सोचा नहीं था। दोस्त तो कह रहा था लड़की सुन्दर है। सुन्दर, पर इतनी सुन्दरता मेरी कल्पना से परे थी। तुम मेरे नजर को भांप गई। मैंने कहा- "चलो अन्दर।" फिर हम अन्दर चले आए।

बैठक में सिर्फ मैं और तुम थे। मैं तुम्हारा सुबह का सूरज जैसा चेहरा देखने लगा। तुम मेरे बैठक को देखने लगीं। पर उस कमरे में ध्यान देकर देखनेवाली तो वैसी खास कुछ नहीं थी। टेबल पर रखे हुए फूल बासी पड़ गए थे। सिंगापुर से लाई गई घड़ी भी वक्त बताना भूल चुकी थी। सोफे पुराने पड़ गए थे। एक आकर्षक लड़की की नंगी तस्वीरपर तुम्हारी नजर थम गई। तुम बहुत देर तक उस तस्वीर को देखती रहीं। मुझसे नजरें चुराकर भी तुम उसी तस्वीर को देखती रहीं। शायद तस्वीरवाली से खुद को तौल रही हो ? है न ?

"यह किसी कलाकार की तस्वीर है जो मेरी विदेशी दोस्त(गर्ल-फ्रैंड) ने दी है। मैं तुम्हारी नजर उस तस्वीर से हटाना चाह रहा था।

"यह तस्वीर मुझे बहुत अच्छी लगी। पर बैठक में क्यों..........? बहुत लोग आते जाते हैं।" तुमने पूछा। मुझे मालूम था तुम यह सवाल करोगी।और इसका जवाब मैंने तुरंत दिया- "नंगा होना मानव की प्रकृति है, सुन्दरता है। प्रकृति ने उसे नंगा ही पैदा किया है। क्यों हम कृतिमता की चादर ओढ़ें ?"

तुम ने मेरी बातें ध्यान से सुनी। इसलिए मैं छोटामोटा भाषण देने को तैयार हो गया- आदमी प्रकृति से जन्मा है और वह प्रकृति में ही खुश होता है। हमने ही सुन्दर प्रकृतिको बलात्कार किया और उसे कुरूप कर दिया है। हमें प्रकृति के शाश्वतता और सुन्दरता को संरक्षण देना है।

इसी वक्त कान्छो दूध लेकर आ पहुंचा। मैंने उसे दो प्याले चाय बनाकर लाने के लिए कह दिया। और वह दौडते हुए किचन में चला गया। वह गैस चलाने लगा और हमें गैस की अजीब सी गंध सताने लगी।कहीं गैस सिलिन्डर से लीक तो नहीं हो रही।मैं उठा और किचन की तरफ चला गया और कान्छो को चाय में चिनी कम रखने के लिए कह आया।

चाय टेबल में आ गई थी। चाय की भाप के साथ ही हमने बात करने की कोशिश की पर बातचित का मुद्दा तय नहीं हो पा रहा था।मैं याद करने की कोशिश करने लगा।

मुझे मालूम था तुम नौकरी की बात करोगी।क्योंकि कल रात ही मेरे एक दोस्त ने तुम्हें कहीं एडजस्ट करने की बात कही थी, और 'बाकी बातें अपने जिम्मे' की बात कही थी। कल रात शायद स्कॉच कुछ ज्यादा ही लग गया। मैं हवा में कहीं उड़ रहा था। उड़ान तो अच्छी थी, बादलों से लुकाछिपी खेलना अच्छा लग रहा था। वहीं पड़े रहना बोरियतवाला काम था और मजा भी न आता। मैंने तुम्हारी नौकरी को बादलों के बीच की उड़ान से तुलना की। यानि कि तुम्हें नौकरी दिलवा देने या देने की बात जितनी आनन्द और उत्साहवर्धक थी, उसके नतीजे की स्थिति जमीं में पछाड़ खाने जैसी थी। इस मामले में मेरा खास अनुभव था। उम्र के दौर में चालीस पार कर जाने पर लातें खाने की प्रकृया तीब्रतर हो जाती हैं।

"तुम क्यों आई हो?" मैंने अब शुरू किया क्योंकि हम चाय पी चुके थे।

"कहीं एडजस्ट होने के लिए।" तुमने सरलता से अपनी बात रख दी।

"एडजस्ट...........नौकरी ढूंढ रही हो ?" तुम ने हां में शर हिलाया जो मुझे अच्छा लगा।

"तुम्हारी शिक्षा कितनी है और अनुभव कितने वर्षों का है?" मैंने एक ही बार में पूछ  डाला।

फिर तो तुम गंभीर बन गयीं। थोड़ी देर बाद खयाल आया यह सवाल तो मुझे करना ही नहीं चाहिए था। पर तुम्हारी नौकरी के लिए कहीं एप्रोच करने के लिए यह जरूरी भी था। जवाब में तुमने टाइप किया हुआ बायो-डेटा मेरे सामने रख दिया।जो इस तरह का थाः

नामः प्रीति

जन्मस्थानः उदयपुर

शिक्षाः दशवीं पास

अनुभवः टेलिफोन व गार्मेंट संबधि

पताः नया बानेश्वर

यह बायोडेटा साधारण सा था। मुझे मालूम पड़ गया तुम प्रीति हो। पर उस बायोडेटा में तुम्हारी जाती नहीं लिखी थी नहीं यह जानकारी भी नहीं थीकि तुम विवाहित हो या अविवाहित। अनुभव भी कुछ स्पष्ट नहीं था। जन्म की तारिख न होने से तुम्हारी उमर का पता भी नहीं चला। मैंने इन बातों को जानने की कोशिश नहीं की। मैंने पूछा- "कितनी पगार की आशा करती हो ?"

"कम से कम दो हजार भी न हों तो काठमांडू में कैसे जीया जा सकता है ?" तुमने कहा और मैंने शर हिलाकर समर्थन जताया।

"बायोडेटा में फोटो तो नहीं है ?" मैंने दूसरा सवाल दागा।

"मैं खुद सर के सामने उपस्थित हूं तो फिर फोटो की क्या जरूरत ?" तुम्हारा जवाब सटीक था।

तुमने पहली बार मुझे 'सर' पुकारकर मान्यता प्रदान की यह अच्छी बात थी। पर मुझे यह बात अच्छी नहीं लगी क्योंकि मैं तुम्हें दोस्त के रूम में देखना चाहता था। तुमने पहली मुलाकात में ही बॉस और मुलाजिम का संबन्ध गढ़ना चाहा जो मुझे सहज नहीं लगा।

"नौकरी देनेवाले तो दूसरे लोग हैं और वे तुम्हारा फोटो देखना चाहेंगे...... फिर मांबाप और जाति के बारे में भी कुछ नहीं लिखा।"

"औरत का कोई जात होता है सर ?" तुम गंभीर रूपसे मुस्कुराईं। मैंने सोचा - आजकल की लड़कियां मेकअप के अलावा बातें बनाना भी खूब जानती हैं।

"इसका मतलब तुम शादीसुदा नहीं हो ?" मैंने पूछा।

"आपको मैं बेटी जैसी नहीं लगती क्या ?" यह मेरे लिए मुश्किल सवाल था। मेरे दिमाग में तूफान उठने लगा। क्या मैं इतना बूढ़ा हो गया हूं ? मुझे वक्त ने इतनी दूर एकांत में ला पटका है ? अर्थात् मेरे वक्त के स्वर मिटने लगे। मुझे लगा मैं वहां से उठकर चला जाऊं। चक्कर सा आने लगा और लगा मितली हो जाएगी। मेरे चेहरे पर अचानक आए परिवर्तन से वाकिफ़ हो तुमने सवाल किया- "आज सर की तबीयत ठीक नहीं है क्या ?"

"कल ज्यादा शराब पी गया था। सबेरे से ही हैंग ओवर है, शर दर्द से फटा जा रहा है।" मैंने स्थिति को सहज बनाया। पर भीतर से मैं जल रहा था और भन्ना रहा था। सेरे सारे रास्ते बंद होते देख मैं घबरा गया। सोचने लगा- भाग्य ने मुझ को प्रदूशित नदी के किनार में ला फेंका है।कान्छा को और दो कप चाय का ऑर्डर देकर मैं खुद को आश्वस्त करने की कोशिश करने लगा।

तुम वातावरण में सहजता ढूंढ रही थी। कहा- "मैं सर को दुःख दे रही हूं, क्या करूं, मैं बहुत अभागिन हूं सर !"

"तुम्हारी बीती हुई कहानी मुझे नहीं सुननी प्रीति। क्या फायदा सुनकर भी। सभी डेवलपिंग कन्ट्री के लोगों की कहानी एक सी होती है। वक्त, जगह और नाम में अंतर होता है बस " मैं जरा दार्शनिक हो चला था। नौ बजनेवाले थे और मुझे फैक्टरी के लिए देर हो रही थी। वहां आजकल बहुत काम बढ़ गया था। जर्मनी व अमरिका के खरीदकर्ताओं ने न केवल ऑर्डर बढ़ाया था बल्कि वे खुद फैक्टरी देखने के लिए आनेवाले थे।

"सरका परिवार कहां है ?" तुमने दूसरा सवाल किया।

"घरवाली अमरिका चली गई, बेटों के साथ रहने। मैं अकेला बूढ़ा यहां हूं। एक नौकर के सहारे मुझे छोड़ गए हैं।" कहते हुए मैंने हंसने की कोशिश की पर मुझे मालूम था उस हंसी में कड़वाहट घुला हुआ था।

बैठक में रखे हुए मेरे पुराने फोटो पर तुम्हारी नजर अटक गई। आज से तीस साल पुरानी वह तस्वीर एक सुन्दर व आकर्षक युवक की थी तब। मैं अब जल्दी में था। तुम्हें शायद अपनी नौकरी पक्की करनी थी। परन्तु मेरे यहां तो नौकरी थी नहीं।

मैं क्या चाहता हूं तुम्हें मालूम करना चाहिए था मैंने पूछा- आज कौन सा दिन है ? मैं आजकल बहुत व्यस्त हूं।

"रविवार" तुमने झट् कह दिया।

"शुक्रवार को आ जाओ.........गुड फ्राइडे.....शाम को क्यों ? मैं उसी दिन तुम्हारी नौकरी पक्की कर दूंगा।" मैंने स्पष्ट शब्दों मे कहा और तुम चली गईं।

रविवार से शुक्रवार तक के छह दिन मेरे लिए कष्टकर गुजरे। एक युवती के बारे में इतना सीरियस शायद मैं पहली बार हुआ था। छह दिन तक भावुक बनता रहा और अच्छी सी शुक्रवार का इन्तजार करता रहा। दिन कैसे बिते मैं याद नहीं कर सका। पर इस दौरान मैं सिर्फ तुम्हें याद करता रहा। प्रीति को याद करता रहा और खुद से सवाल करता रहा- इस उमर में भी कोई प्रेम में पागल हो सकता है क्या ? क्या बूढ़े पेड़ में भी फूल खिलाया जा सकता है?

वह शुक्रवार का दिन था। मैंने ऑफिस से छुट्टी ले रखी थी। उस दिन का सूरज चाय के साथ न हो कर रेडलेबल ह्विस्की के साथ उगा था। अपने सफेद बालों में कालिख पोतकर काला बना लिया था मैंने। चेहरे पर क्रिम लगाकर दिनभर फ्राइड चिकन के साथ 555 सिगरेट पीता रहा। स्टार टी वी के उत्तेजक दृश्यों को देखकर खुद को कामुकता की लहरों पर उद्वेलित करता रहा। अखबार हाथ में था पर उसमें क्या छपा था मुझे मालूम नहीं था। मैंने खुदको तीस साल पहलेवाले अपने रूप में ले जाने की कोशिश की। वो भी एक समय था जब सिर्फ प्रेम के गीत गाते थे, प्रेम की कविताएं लिखते और पढ़ते थे। वो क्या वक्त था - चौराहे पर घंटों बैठते। मैंने फिल्म फेयर देखकर रख दिया। मुस्तांग का घोड़ा बनने के लिए मुस्तांग की दो गोलियां निगल ली। समय खाली ही बीत रहा था। सिर्फ शून्य था और खाली दिमाग में ह्विस्की का प्रभावपूर्ण आक्रमण था।

फिर तो वही बात हो गई। शुक्रवार शाम को तुम आईँ और उसी तरह कालबेल बजाने लगीं। मैं खुद दरवाजा खोलने के लिए जा पहुंचा।

"क्या घर में कोई और नहीं हैं जो सर खुद दरवाजा खोलने आ पहुंचे ?" तुमने पूछा।

"आज तुम्हारी सेवा कर रहा हूं।" मैंने मुस्कुराते हुए तुम्हें छेड़ा। हम फिर बैठक में आ गए। टेबल में ह्विस्की और बियर की बोतलें थीं।

"क्या लोगी ?" मैंने पूछा।

"कुछ नहीं।" तुम्हारा जवाब था।

"मैं तो ह्विस्की लूंगा। एक ग्लास बियर नहीं लोगी ?"

"मैंने कभी पी नहीं है।"

"तब आज पी लो न....।"

मैंने एक ग्लास में बियर उंडेलकर तुम्हारे हाथ में थमा दिया। तुमने बियर चाय की तरह धीरे धीरे न पीकर मठ्ठे कि तरह एक ही बार में पूरा ग्लास गटक लिया। मैं हैरान हो गया और एक ग्लास और तुम्हारे हाथ में दे दिया।

"तुम किस तरह की नौकरी करोगी ?" मैंने गंभीर हो कर पूछा।

"जैसी मिलेगी... खाने पीने और रहने के लिए पैसे हों बस्....." तुम्हारे चेहरे पर रङ चढ़ने लगा।

तुम और लाल दिखने लगी। तुमसे बातें करने के लिए मेरे पास विषय नहीं था। थोड़ी देर सोचता रहा। हां तुम जब पहली बार आईं थी तो तुमने मेरे फोटो बारे में पूछा था और बहुत देर तक देखती रही थीं। मैंने पूछा- "मेरा फोटो कैसा लगा ?"

"बहुत अच्छी ! अति सुन्दर ! पर क्या वह फोटो आपका ही है ?"

"क्या मेरा जैसा नहीं लगता ?"

"नहीं, बिलकुल नहीं। उस चेहरे में जो यौवन का तेज है, जिस सौन्दर्य की मान्यता है वह आपमें कहां ? आप जल्दी बूढ़े हो गए लगते हैं.......।" तुमने कमेंट किया।

"हां वैसा ही है। मैं अपनी इच्छा से बूढ़ा तो नहीं हुआ, न ही अब होना चाहता हूं। पर प्रकृति से कोई लड़ सका है क्या ?"

शाम होने को आई थी। उस दिन लोडसेडिङ का दिन था। कैंडल के शुभ्र उजाले में तुम्हारा चेहरा देखकर देखकर भूपि शेरचनकी एक कविता "मैन बत्ती को शिखा" अचानक याद आ गई।

"चिली चिकन खाओ न...... मैंने खुद बनाया है।"

"अच्छी है, बहुत स्वादिष्ट है।"

"कैसी अच्छी ?"

"शहद जैसी.........." तुमने कमेन्ट किया।

मैं एक किस्म से शून्य हो चला था। मैं अमरिका में बिताए गए हसीन लम्हें याद कर रहा था। मैंने तुम्हें पास बुलाया साथ बैठने के लिए। तुम डर गईं। तुम्हारी भयभीत आंखें हिरण की जैसी लगीं - जो शिकारी के भय से छिपती रहती हैं जङ्गल में। मैं उत्तेजित होने की कोशिश करने लगा। एक जवान औरत के आगे खुद को उत्तेजित करने की बिसंगति ने मुझे निराश कर दिया। पर मैं तैयार तो हो गया। मैंने तुम्हारे नरम हाथ लिए और सहलाने लगा।

"क्या आपको शोभा देता है ? ऐसी हरकत करते हुए इस उमर में ?" दो शब्द मेरे भीतर पहुंचे और कहीं गुम हो गए।

"मैं तुम्हारी हस्तरेखाएं देखूं ! तुम्हारा भाग्य कैसा है? कैसा पति मिलेगा ? कैसी नौकरी मिलेगी ? बच्चे कितने होंगे ?" तुम्हारे नरम और कमसिन हाथ लेकर उन्हें सहलाता रहा। खेलता रहा उनसे। ज्योतिष विद्या का क भी न जाननेवाला आदमी का हस्तरेखाएं देखकर भविष्यवाणी करना कम हास्यास्पद नहीं था। किन्तु मैं मजबूर था। तुम सहज नहीं हो रही थीं, यह बात मुझे अच्छी तरह मालूम थी। और तुम्हारा लजाना, तुम्हारा न खुल पाना मुझे खुशी और आनन्द दे रहे थे।

मैंने तुम्हें बाहों में लिया और चुमने की कोशिश करने लगा। तुम्हारे होठों से अपने अपने होंठ सटाए और आनंदानुभूति करने लगा। तुम्हारे उरोज सहलाए। यौन आवेग को शान्त करने की कोशिश करने लगा। तुम खुद को मुझ से मुक्त करने की कोशिश में लगी थीं। मैंने तो तुम्हें न छोड़ने की कसम ही ले रखी थी। मैं अपने तीस साल पुरानी जवानी को पुनर्जीवित करने की धुन में था। मैं बिगत में जाकर जंगबहादुर बनना चाह रहा था और तुम्हें भोगना चाह रहा था।

लगता था वक्त थम गया है। लोडसेडिंग का वक्त अभी खत्म नहीं हुआ था। मैंने अपने अन्दर बहुद गर्मी महसूस की। वह गर्मी बिजली के तार में जैसे ही मेरे बदन के नीचले हिस्से में बह गई। ठीक उसी वक्त एक ठंडी लहर दौड़ गई बदन में। मैंने बरफ होने का यथार्थ स्वीकार कर लिया। लगा एक लहर बहुत ऊंचा उठकर फिर बैठ गया है। लोडसेडिंग खत्म होने पर हम वहां नहीं थे।

उसके बाद दूसरे दिन के स्थानीय अखबार में मैंने तुम्हें रेप किया - ऐसी सनसनीखेज खबर छपी थी।

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मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी


सम्वत् 2000 में भोजपुर बाजार, कोशी, में जन्में श्री परशुप्रधान की दश कहानी संग्रह,तीन उपन्यास, दो कविता सङ्ग्रह, दो भेटवार्ताएं और चार साहित्य इतर कृतियां प्रकाशित हैं। वे नेपाल के बहुत से प्रतिष्ठित और सम्मानित पुरस्कारों से नवाजे जा चुकें हैं।

बहुत सी साहित्यिक संस्थाओं में आबद्ध श्री प्रधान, विराटनगर में रहकर साहित्य सृजन करते हैं।