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अक्षर वर्षा ? भीष्म उप्रेती
सबेरे ही सूरज पिघलने से पहले आज बादल पिघल गया और मुठ्ठीभर अक्षर गिर गए धरती पर।
पानी बरसता तो मैं दरवाजे-खिड़कियाँ बंद करता उजाले को बाहर ही छोड़कर कमरे में सिकुड़ जाता, पर मैंने खिड़कियाँ खोल दी खिड़कियों के परदे सरकाए दरवाजे खोल दिए फिर बाहर निकल गया।
बूंदों की भांती बरसने लगे अक्षर जमीं पर एक दूसरे से मिल बनने लगे शब्द और फिर शब्द मिलकर वाक्य बने अर्थ बने
अक्षरों का सङ्गीत सुनते सुनते संभल नहीं पाया मैं, गिर गया उनके बीच मैं भीगने लगा अक्षर वर्षा से अक्षर-संगीत और अनुभूति से भीगने लगा तृप्तिका हरा रंग चारों ओर से उठकर चूमने लगा मुझे बेतहासा !
कुछ देर बाद मैंने देखा खुली हुई खिड़कियों से, दरवाजों से अक्षर भीतर दाखिल होने लगे फिर कोनों पर विसरे अंधेरों पर धावा बोल दिया
अरे ! तो क्या मैं बरसों से प्यासा था मैं ? अब मालूम हुआ मैं अक्षरों के तलाश में प्यासा भटक रहा था।
नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी |
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सम्बत् 2024 में झापा जिले के छोटे से कस्बे शनिश्चरे में जन्मे श्री भीष्म उप्रेती की तकरीबन सात पुस्तकें प्रकाशित हैं। वे कविताएं, निबन्ध और यात्रा साहित्य लिखते हैं। विभिन्न पुरस्कारों से नवाजे जा चुके श्री उप्रेती काठमांडू में रहते हैं। सम्पर्कः bhismaupreti@yahoo.co.uk |