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अर्ध पुलिस

? विवश पोखरेल

वह खाली हाथ लौटा। उसकी स्फूर्ति गायब हो चुकी थी।

"क्या हुआ ? नहीं मिला क्या ?" बॉस ने पूछा।

"मिला सॉब ! घर पर ही था।" वह सर खुजाने लग गया था।

"फिर क्यों खाली हाथ लौट आया ?" बॉस की आवाज तिखी हो गई थी।

वह चुपचाप खड़ा रहा। बोला कुछ नहीं।

"सुनता नहीं बे..। तेरे बाप को क्यों नहीं पकड़ लाया ?" बॉस का गुस्सा बड़ रहा था।

"मैं उसे गिरफ्तार नहीं कर पाया सॉब !" उसने अपनी नाकामी जाहिर कर दी। वह बॉस के डर से भिगी बिल्ली बना हुआ था।

"ओए गधे ! एक मरियल को भी पकड़ नहीं पाया तू ?" उसकी नाकामी से बॉस के गुस्से में इजाफा हो रहा था।

"सॉब उसकी एक बूढ़ी माँ थी, बीमार पत्नी और छोटे छोटे बच्चे थे, मुझे दया आ गई।" वह भावुक बन गया था।

"तुझे गिरफ्तार करने भेजा था या दया दिखाने। तुझे क्या मतलब उसकी बूढ़ी माँ, बीमार पत्नी और छोटे बच्चों से ?" बॉस उसी तरह बोल रहे थे।

"मैंने उसकी माँ की आँखों में अपनी माँ का चेहरा देखा सॉब !"

"फिर उसकी पत्नी में अपनी पत्नी दिखाई दी, क्यों ?" वह बात भी खत्म न कर पाया था की बॉस चिल्ला उठे।

"मैं जब उसे पकड़ रहा था तो उसकी माँ और पत्नी ने मेरे पैर पकड़े और रोने लगे । माँ बोलने लगी – 'कल मैं ही उसे भेज दूँगी। आज तो मकै लगाने के लिए खेत जोतना है। बैल एक दिन के लिए माँगकर लाए हैं। खेत वैसे ही पड़ा रहा तो मालिक रूठ जाएगा और अपना आधा हिस्सा भी नहीं मिलेगा। ये बच्चे भूखे मर जाएंगे।' फिर मैं कुछ नहीं कह पाया सॉब। एक तरफ बॉस का गुस्सा बढ़ रहा था और दूसरी तरफ उसका भय भी बढ़ रहा था। अपने पहले कर्तव्य में नाकाम रहा था वह। वह झूठ बोल सकता था पर उसने ऐसा किया नहीं।

आज सबेरे ही जाग उठा था वह। गजब की स्फूर्ति थी। नहा धोकर मन्दिर हो आया था। भगवान से आशीर्वाद माँग बैठा था – "हे प्रभु ! आज मेरा पहला दिन, मेरी नौकरी अच्छी हो कोई बाधा अड़चन न हो। परिवार का दुःख कम कर सकूँ।" ट्रेनिंग के दौरान काटे हुए बाल, धूप से जले चेहरे पर आज दूसरा ही रूप था। शिर में टोपी पहनकर "जो भी है, अच्छा है।" कहकर वह ड्यूटी चला था। जिस आदमी को वह पकड़ने गया था उसे चोरी का सामान खरीदने आरोप लगा था। एक आदमी ने चोरी का माल बेचने की बात बयान में कही थी और उसे खरीददारों को पकड़ने भेजा गया था। पहले उसके साथ एक और जवान भेजने की बात तय हुई थी लेकिन अचानक उसे कहीं जाना पड़ा और वह अकेला पड़ गया था।

"पुलिस का दिल तो पत्थर का होना चाहिए। दया, प्रेम जैसी बातों को मन से दूर फेंकना पड़ता है। तुझे क्या ट्रैनिंग में नहीं सिखाया गया ?" वह चौंक पड़ा था, बॉस की आवाज से।

"सिखाया तो था सॉब ? लेकिन......" वह तकरीबन रोने की स्थिति में पहुँच गया था।

"खाक लेकिन ! समझ गया, तू हमारे यहाँ नहीं टिकनेवाला। कवि-हृदयवाला आदमी डॉक्टरी और पुलिसी में ठीक नहीं बैठता। तेरे बापू समाजसेवी थे क्या ?" बॉस के सामने वह व्यंग बना खड़ा था। बॉस बाप-दादों तक पहुँच चुके थे।

" नहीं सॉब ! खेती करते हैं।"

"फिर क्यों हल चलाना छोड़कर तू बंदूक पकड़ने आया है ?"

"पेट के कारण !"

"कौन से नेता ने तुझे पुलिस के लिए सिफारिस किया ?"

"किसी ने नहीं सॉब ! अपने बलबूते पर पुलिस बना हूँ।"

"देख, तू पूरा पुलिस नहीं बन पाया है। अर्ध पुलिस है तू। पूरा पुलिस बनने की कोशिश कर। आधे पुलिस वे हैं जो, कठिनाई से जूझने के बजाय चौकी छोड़कर भाग खड़े होते हैं। ऐसा ही हाल रहा तो तूझपर कौन भरोसा करेगा ? तू नया है, बहुत कुछ सिखना है तूझे।"

उसकी नरमी से बॉस कुछ शांत हो रहे थे। उसने गहरी सांस ली। उसके हाथ में एक कपड़े की गठरी की तरफ इंगित करते हुए बॉस ने कहा – "वह क्या है ?"

"दसी है, सॉब !" उसने गठरी खोलते हुए कहा।

"दसी ले आया और आदमी को छोड़ आया ! अरे बूद्धू ! कल नरे और तू जाकर पकड़ लाना उसे, अगर वह नहीं भागा तो। गिरफ्तारी का इंतजार किस अपराधी ने किया है ? तूझ जैसों से ही पुलिस बदनाम है।" उसकी नासमझी पर बॉस ने फिर प्रहार किया।

जीभर बॉस की गाली से उसे लगा सचमुछ वह नाकाम है। कमरे में आकर अपने पलंग पर पसर गया। दिमाग में बॉस के शब्द घूम रहे थे। वह सोच रहा था – क्या मेरा नर्म दिल पत्थर में बदल सकता है ? क्या मैं पूरा पुलिस बन सकता हूँ ?"

इन सवालों के जवाब उसे कहीं नहीं मिले। शायद कल का वक़्त ही जवाब दे।

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नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी

 

 
   

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