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झोला

--कृष्ण धरावासी

 

मैं जब ऑफिस से लौटा तो शाम ढल चुकी थी। यह हर रोज का नियम था कि रास्ते में मिले यारों और बन्धुओं के संग ऑफिस, देश, सरकार आदि विषयों पर बात करने की औपचारिकता निभाते हुए घर पहुंचने पर देर हो ही जाती थी।

घर के लोग शाम का भोजन कर चुके थे। मेरे लिए भोजन हॉटकेश में रखा हुआ था। मैं हाथ-मुह धोकर थोड़ा आराम करने क गरज से बरान्दे की खटिया में पलथी मारकर बैठ गया। समने नज़र गई तो वार में एक अनठा झोला लटकता दिखाई दिया। वैसा झोला तो हमारे घर में था नहीं और होता भी तो उसे वैसे लटकाने की जरूरत नहीं थी। क्या है उस झोले में ? चालाख होकर देखने के लिए आगे बढ़ा तो बदन में ठन्डी सिहरन दौड गई।

आजकल देश की अवस्था ठीक नहीं है। जिधर देखो लट, हत्या, बलात्कार जैसी घटनाएं धडल्ले से घट रहीं हैं।  वैसे अन्जान झोले मुसिबत ला सकते हैं। मैंने सीताजी से पूछा तो व कहने लगीं- 'दोपहर को एक करीब साठ पैंसठ के बुजुर्ग आए थे। कुछ देर बैठे। हमने उन्हें चायनास्ते से स्वागत किया। आपको पूछ रहे थे। कह रहे थे धरावासी सर को देखा भी नहीं है।  उनके दादाजी का घर हमारे पहाड की तरफ ही बता रहे थे। मणिपुर से नेपाल आए वर्षों बीत गए। शरणामती में अपनों के यहां शरण ले बैठै हैं। नागरिकता न होने कि बजह से जो कुछ कमाकर लाए थे उसे बैंक में भी नहीं रख पाए और जमीन जायदाद भी नहीं खरीद पाए। रिस्तेदारों को सूद पे रकम दे बैठै जो अब वे लौटाने का नाम नहीं ले रहे हैं। शुरूवाती दिनों में  वही रिस्तेदार नागरिकता दिलवाने के लिए मद्दत की आस देकर बाद में पिछे सरकने लगे। अब तो अच्छी तरह से बोल भी नहीं पा रहे थे। - 'बालबच्चों का स्थिति खस्ता है। अपने परिवार के भरण पोषण के लिए काफी धन लेकर नेपाल आया था। लोगों ने भिखारी बना दिया हुजुर !' कहते हुए उनकी आंखों से आंसू लुढक गए। ऊपर जयपुर में कोई मणिपुर से आए रिस्तेदार से मिलने गए हैं। 'कल त लौट आऊंगा तब तक यह झोला यहीं टांग दीजिए- इस भरी दोपहरी में ढोया नहीं जाएगा' कहते हुए यहीं टांग कर गए हैं।

छोटे से वक्त में सीताजी उन अपरिचित महाशय की कहानी कह गईं। सुनकर मुझे भी उनके प्रति सहानुभूति जाग गई। फिर भी झोले की बात से मैं पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो सका। मन में शंकाएं और उपशंकाओं के रहते खाना खाया।  हाथ पोंछे बगैर फिर उसी जगह आ बैठा और झोले को एकटक देखने लगा।  न जाने क्यों मन भारी होने लगा। फिर सीताजी से कहा- " देखो सीता ! चाहे जो भी हो अन्जान आदमी से आजकल कुछ लेने से, उसका दिया हुआ खाने से या उसके दिए हुए चीजों को रखने से आदमी मुसीबत में फंस सकता है।  क्या पता ऐसे झोले में बम रखते फिरते हो ? कैसे विश्वास करें किसी को ? उसने जो भी कहा वह झूठ भी हो सकता है और वह ठग और लुटेरा भी हो सकता है। तुम लोग, जो घर में रहते हो, थोड़ी सावधानी बरता करो। जिस किसी पर भी विश्वास किया नहीं जा सकता। उस बूढ़े आदमी को चाय नास्ता दे ही दिया था, वह झोला लेकर चलता बनता। मालूम है ! उसने कल के खाने का भी इन्तजाम कर लिया।

मेरी बात सुनकर सीताजी गंभीर बन गईं। मां भी बौरा गईं जैसे अभी होस में आई हों। फिर क्या था, सभी उस झोले को शंकास्पद दृष्टि से देखने लगे र सबके मन में त्राश बढ़ने लगा। उसमें बम होने की आशंका फीसदी में बढ़ने लगी।   

मैं उठकर झोले की तरफ बढ़ा तो सीताजी और मां चौंककर मुझे रोकने लगीं। पर मैं उनके हाथ झटककर आगे बढ़ा और झोले को अपने अधीन कर लिया। झोला ज्यादा भारी तो नहीं था पर ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसमें कुछ विशेष है।

मैं पहलेवाले स्थान में आकर जम गया और झांकने लगा झोले के अन्दर। मां कहने लगीं- "क्यों अनजान आदमी के झोले को छेड़ता है ? जाने क्या रखा हो। कल बेकार में अपजस मोलना पड़ेगा।"

मां की बातों को नकारकर मैंने झोले से एक छोटी सी गठरी निकाली। गठरी के अलावा झोले में कुछ कपड़े और कुछ सामान थे।  गठरी को अच्छी तरह से बांधा गया था। गांठ खोलने में कुछ वक्त लगा। गठरी के अन्दर कागज का एक पुलिन्दा मिला। धीरे से पुलिन्दे को खोलकर देखने लगा।

घर के सब सदस्य अपना काम खम कर बैठक में आकर बैठ गए। मैं भी उस झोले के साथ कागज का पुलिन्दा लेकर बैठक में ढुक गया। टीवी खुली हुई थी। मां, सीताजी और बच्चे उस पाकिस्तानी  धारावाहिक की प्रतिक्षा में थे जो क्लाइमेक्स में पहुंचनेवाला था।

पर मुझे झोले में मिले उस कागज के पुलिन्दे ने खींच लिया था। नेपाली कागज को मोडकर बनाए गए चोंगे जैसे उस पुलिन्दे को देखकर मुझे लगा कहीं वह आदमी जन्मपत्रियां लेकर ज्योतिषी को ढूंढ़ने न निकला हो।  दुःख से हारा हुआ आदमी सुख के पक्ष में खड़े जिस किसी बात पर भी विश्वास कर लेता है।  शायद उन बुजुर्ग को भी ज्योतिषियों के प्रति विश्वास बढ़ा हो, मैं ऐसा ही कुछ सोचने लगा।

मैनें वह कागज का पुलिन्दा खोला। कागज पुराना पड़ गया था और उसमें बांस के कलम को स्याही के दवात् में डुबोकर लिखे हुए, कुछ मोटे पर सुन्दर अक्षर थे। कई जगह पर अक्षर की जगह छेद बन गए थे पर उनको भी अच्छी तरह से पढ़ा जा सकता था। टीवी का धारावाहिक मुझे कागज के पुलिन्दे से ज्यादा खींच नहीं पाया। मैं धीरे से पढ़ने लगा। लिखा था-

एक

उस समय मेरे पिताजी  बूढ़े थे और मां सिर्फ सत्ताइस की। पहली  बीवी चार सन्तानों को जन्म देकर चल बसी थी और पिताजी ने अपने से चालीस साल छोटी लड़की (मेरी मां) से शादी की थी। उस समय शादीब्याह में लड़के के उमर की कभी परवाह नहीं की जाती थी और बालविवाह से लड़कियों का जीवन नारकीय बन जाता था। मेरे ग्यारह के होने पर भी मेरी मां दूसर बच्चा नहीं जन सकी। सौतेली मां बेटे सब जवान थे। मझले भैया का लड़का भी मुझसे सिर्फ दो बरस छोटा था।  सौतेले भाई सब अलग हो कर बस गए थे।

छोटी सी बिमारी से पिताजी चल बसे। इतनी जल्दी पिताजी चल बसेंगे, ऐसा किसी ने भी सोचा नहीं था। पर कुछ दिनों से पिताजी के बोलने का ढंग बदल गया था। वे अनूठी बातें करने लग गए थे। एक दिन मैंने सुना वो मां से कह रहे थे- "कान्छी ! तू ने मेरी बुढ़ापे में बहुत सेवा की। तुझे भगवान् देखेंगे। कहीं मैं मर गया तो, तू सती नहीं होना, इस लड़के को पालपोसकर बढ़ा करना।"

पिताजी की बात सुनकर मां बरस पड़ी थीं- "इन बूढ्ढे को भी न जाने क्या क्या सूझता है। कौन मर रहा है इतनी जल्दी ?"

"मौत का क्या भरोसा, काली ! जो कोई जब भी मर सकता है।" पर पिताजी की वो बोली मां के अन्दर कहीं सिहरन पैदा कर गई है, ऐसा लगा था मुझे। मैं तो बच्चा ही था, खेलने कूदने में ही रमता फिर भी मेरे हिस्से में बहुत सारे काम पड़े थे। मुझे सुबह के भोजन के बाद मवेशियों को चराने ले जाना पड़ता था। भाईयों के बच्चे दुष्ट थे। मवेशियों के समूह से मेरे मवेशी खदेड़ देते थे। फिर मैं सिर्फ अपने मवेशियों को लेकर जंगल में भटकता रहता।

पिताजी की उस बात के कुछ दिनों बाद ही वे बमार पड़ गए।  हर किस्म के दवादारू के अलावा पन्डित-ओझे आदि से भी कुछ नहीं बना। अंत में ओझों ने तय किया की यह सब कुलदेवता का किया धरा है। फिर एक दिन सूरज ढला तो पिताजी चल बसे। मैं जंगल में मवेशियों के साथ था, इसलिए मुझे लेने लोग वहीं आ पहुंचे। उस दिन मुझे मयुर के चार अंडे मिले थे, जिन्हें उबालकर खाने के लिए मैंने जतन के साथ रखे थे। पिताजी की मौत की खबर सुनते ही मेरे हाथ से सब अंडे गिरकर फट गए और जमीं प बिखर गए। मेरा बदन नरम पड़ गया। परसों ही तो पिताजी ने मां से कहा था- "मैं यदि मर जाऊं तो तू सती न होना।" मैं डर गया। चारों तरफ अंधेरा छा गया।

जो लोग लेने आए थे वे मुझे समझा रहे थे, यों कहें दूसरी बातों में उलझाकर मेरा ग़म कम करने की कोशिश कर रहे थे। घर में लोग जमा हो चुके थे। रोनाधोना चल रहा था और शोर भी काफी था। मेरे पहुंचते ही चाचिओं ने मुझे गोद में बिठा लिया। मुझे मां के पास जाने से रोका। मां को भीतर कहीं कोने में रखा था। मैं चाची के गोद से छिटक कर मां की तरफ जाने लगा तो उन्होंने रोक लिया- 'उस तरफ मत जाओ बेटा, तुम मां को छू नहीं सकते, वह सती हो गई हैं। हम में से कोई भी उसे छू नहीं सकता।'

मैंने रोते हुए कहा- "पिताजीने मां को सती न होने के लिए कहा है। मां सती नहीं है....मां सती नहीं है....!"

मैं दुःख से जमीन में लोटने लगा। मां भीतर से दहाड़े मारकर रोने लगीं। पिताजी के लाश को श्मशान ले जाने की तैयारी होने लगी। साथ ही मां को सती होने के लिए प्रेरित किया जाने लगा और सती प्रक्रिया की तैयारी की जाने लगी। मां को समझानेवाले, सती की महत्ता की बढ़ाई करनेवाले आगे बढ़कर अपने काम में लग गए।

मैं दूर से देखता रहा।

मां का चेहरा सदा की भांति न होकर अलग और डरावना हो गया था। उनकी दृष्टि भी अजनबियों की जैसी थी। उन्होंने मुझे उन्हें देखते हुए देखा फिर भी कुछ नहीं कहा।

औरतें एक जगहपर जमा होकर मातम मना रही थीं । भाभियां भी कुछ बोल नहीं पा रही थीं। मर्द नियमानुसार काम में व्यस्त थे। लोग कह रहे थे, चूंकी दिन ढल रहा था जल्दी श्मशान जाना होगा, लाश को रातभर नहीं रख सकते।

मैं वहांके पुरुषों को देखकर हैरान हो रहा था। भाइयों, चाचाओं, पड़ोसियों और ब्राह्मणों में पिताजी की मृत्यु कोई शोक नहीं ला पाई थी। ईस घटना में एक स्वाभाविक मौत से मरे बृद्ध के साथ एक युवती भी जल रही थी, यह बात उनको छू भी न पाई थी। संवेदना, सहानुभूति, मानवता कहीं कुछ भी अंकुरित नहीं  हो पाई थी। मैं उस युग की उस बात को सोचकर अभी भी बेचैन हूं।

मुझे लगा मैं बारबार बेहोश हो रहा हूं। लगा काश मैं एकबार मां की गोद में बैठ सकता। पर पुरोहित मां को उकसा रहे थे। कह रहे थे सती को सांसारिक मायाजाल से मुक्त होना है, सिर्फ मृत पति को याद करना है जिससे सीधे स्वर्ग का बास हो। मां एक ही तरफ एकटक देख रही थीं, देखने से लगता वह सांस भी नहीं ले रही थी, लगता वह जम सी गई हैं।

औरतें रो रो कर मेरे शर पर हाथ फेर रही थीं। मां के रूप, उनकी उमर और मेरे बारे में चिंताएं व्यक्त कर रही थीं। वे अपने पतियों में अपनी आयु ढूंढ़ रही थीं। उनके रोदन में, पीड़ा में, शोक में मानों जिन्दा जल जानेकी संभावना बह रही थी। वहां जितनी भी औरतें थीं सब अपने प्राण को पति के दिल की धड़कन के साथ गिन रहीं थीं।

कोई भी मा को सती नहीं होने के लिए प्रस्ताव नहीं ला सका। मां ने भी कोई विरोध नहीं किया। मैं चाची क गोद में लोटकर पिताजी की कही हुई बात बारबार दुहराने लगा।  फिर चाची ने मेरा मुह बन्द करते हुए कहा- "चुप हो जा बेटा ! यहां कोई तेरी बात सुननेवाला नहीं है। देखता नहीं , तेरे पिताजी के लाश से ज्यादा सती को देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी है ? ये अभाग औरतें भी यहां अपना भविष्य के घटना को टटोलने आ धमकी हैं।"

चाची मुझे गोद में रखकर यूं ही बड़बडा़ने लगीं। उनकी आंखों से गिरते आंसू मेरे बाल को भिगो रहे थे। चाची बोलते बोलते कुछ तीखा बोलने लगीं थीं।  चाचा पास आकर चुप कर गए। पर चाची और ज्यादा चिल्लाने लगीं- "क्यों चुप हो जाऊं ? ऐसा अन्याय भी कोई धर्म है ?  क्यों अपने से चालीस साल छोटी लड़की को व्याह करके अब जिन्दा जलने के लिए छोड़ गए ? इतना छोटा लड़का है, बेचारे की कितनी तमन्नाएं होंगी, अभी इसकी उमर ही क्या है ?"

"क्या बात करती है रे तू ? जो चला आ रहा है वही तो धर्म है। अपने दादा दादी ने भी यही भोगा।" चाचा ने कहा।

"अपनी औरत के मर जाने पर मर्द तो खुश हो कर नाचते बजाते कर व्याह कर लाते हैं, मौज करते हैं और मर्द के मरते ही औरत को उसी के साथ जल जाना पड़ता है। यह भी कोई धर्म हुआ ?" चाची को दूसरी औरतें हाथ पकड़कर पिछे ले गईं। चाची बहुत देर तक चिल्लाती रहीं।

कुछ लोग मां को कहीं  पूजा करवाने लगे। मां को गहनों से लादकर दुलहन की भाि सजा दिया गया। बाजे बजाए जाने लगे। शंख-ध्वनि गूंजने लगी। फिर आनन फानन में मां को आगे कर पिताजी की लाश को श्मशान कि तरफ ले जाया या

मैं रोते रोते थक गया था। मेरी रोने की शक्ति गुम हो गई थी। रोना छोड़कर टकटकी बांधे देखने लगा। दिन ढल रहा था और रात होने को आई थी। चाची के मना करने के बावजूद मैं ढलान पर नीचे की दौड़ने लगा। कोई कह रहा था- "छोड दो ! छोड़ दो ! अपने मांबाप का अंतिम संस्कार देखने दो।"

रास्ते में एक जगह देवी का मंदिर पड़ता था। पास में ही एक बिश्रामागार था जिसमें लाश को कुछ देर के लिए रख कर लोग विश्राम करने लगे। बाजे बज रहे थे। शंख भी फूंके जा रहे थे। मन्दिर की परिक्रमा करवाकर मां के सब गहने उतरवाए गए। शर में सरसों का तेल उड़ेला गया। मां के बालों से तेल ऐसे गिरने लगा जैसे नहाए हुए बालों से पानी। बदन के सारे कपड़े उतरवाकर मां को नंगा कर दिया गया। बड़े लोगों को निर्वस्त्र होते हुए मैंने पहली बार देखा। पर मां के नंगेपन में मुझे लाज दिखाई दी न ही अश्ललता उनके नंगेपन से उनके इज्जत और सम्मान में कोई कमी नहीं आई थी। फिर शंख बजने लगा और लाश को नीचे तमोर नदी की तरफ ले जाया गया। घाट पहुंचने पर सूरज पीला पड़ चुका था। लोग जल्दी से चिता तैयार करने लगे। उधर ब्राह्मण सती-विधि की तैयारियां करने लगे। मां को पूजा के कार्यक्रम में व्यस्त कराया जाने लगा। विधि पूर्ण होने पर चिता के एक कोने में मां को पलथी मारकर बैठने के लिए कहा गया। मां हाथ जोड़े पिताजी के शिर को गोद में लिए बैठ गईं। बहुत से शवयात्री अग्निदाह के हृदय विदारक दृष्य से बचने के लिए इधर-उधर बिखर चुके थे। सूरज डूब गया। थोडा सा उजाला भी पहाड़ की बजह से भाग गया।  बड़े भैया ने चिता में अग्नि दी।

चिता धूधू कर जलने लगी और धूवां चारों ओर फैलने लगा। अंधेरा ऊपर से धूवां, श्मशान घाट में रात और गहरा गई।

मैं एक पेड़ की ओट से सब देख रहा था।

चिता में अग्नि देने के बाद पुरुष भी रो रहे थे। कुछ देर बाद आग मां और पिताजी को राख बना गई। अब मेरे जीवन सिर्फ मैं अनाथ बाकी बच गया था।

आज सबेरे प्यार से मुझे खाना खिलाकर मुझे जंगल भेजनेवाली मां शाम को जिंदा जलकर राख हो चुकी थी।

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मैं रात भर सो नहीं सका। चाची ने मुझे अपनी बाहों में लेकर सुलाने की कोशिश की पर उनकी छाती के कंपन ने मुझे सोने न दिया।  चाची बराबर लम्बी सासें ले रहीं थी। उनके नाक से लगातार पानी बह रहा था, उनकी सिसकियां थम नहीं रही थी। मेरे शर पे हाथ रखकर रूंधे गले से उन्होंने कहा- "क्या करोगे बेटे ? हम औरतों के जीवन का कोई मूल्य नहीं है। हमें गाय बकरी के जितना भी नहीं माना जाता। बूढ़ी गाय, बूढ़े बैल को भी लोग बेच देते हैं उनकी हत्या नहीं करते। पर हम मांओं को अपनी ईच्छा के बिपरीत मरना पड़ता है। विवश करते हैं लोग। जिंदा जला देते हैं। जब अपना आदमी, अपना रक्षक मर जाता है बाकी सब आदमी औरत के दुश्मन बन जाते हैं, उसक जान के दुश्मन।"

चाचा ने समझाना चाहा तो चाची ने फिर कहा- "क्या हम औरतें सिर्फ मर्दों के लिए हैं ? जब मर्द ने चाहा छोड़ दिया, कोई गैर हमें जबरजस्ती करे तो हम अछूते बन गए, बस पति त्याग देते हैं। हमारी अपनी सारी इच्छाएं, अपना बदन, अपना श्रम अर्पण करके भी हम उनके प्रेम के अधिकारी नहीं रहते। वे औरतों के ढेर से चुन-चुन कर बीवी बना सकते हैं, कोई मर्द के चाहने भर से औरत को उसका होना होता है, औरत मर गई तो मर्द आज़ाद हो गए और मर्द मर गया तो हमें उसी के साथ जल जाना पड़ता है। यह कहां का न्याय है ?

आप मर्दों के बनाए कानून में अपनी मां, बीवी और बेटी की सुरक्षा नहीं है ? अपनों को जलाकर शोक करने का क्या मतलब हुआ ? क्या इसे बदला नहीं जा सकता ? आज आपलोग मेरी बेटी के उमर की जेठानी को जिंदा जला आए हैं , कल यदि आप अपने शरीर को संभाल नहीं पाए तो मुझे भी उसी तरह जलना होगा न इस नियम में ?

दस महीने हमारे कोख में रहकर, दस धाराओं में हमारा दूध चसकर आपलोग बलिष्ट बनते हैं और कितनी आसानी से हमको ही जला डालते हैं ! क्या यह संसार सिर्फ मर्दों के सुख के लिए है ?"

उन्होंने मेरे शर पर हाथ रखकर कहा- "बेटा, आज तुझे जान से ज्यादा प्यार करनेवाली मां को ये लोग जलाकर आए हैं, कल जब तेरे चाचा चल बसेंगे तो मुझे भी इसी तरह जला डालेंगे। उस दिन मेरी चिता पर तू भी लकड़ी चढ़ाएगा। तू भी तो कल का वही निर्दयी मर्दका छोटा रूप है। पर मैं आज तुझे प्यार करूंगी और तुझे बढ़ाउंगी। बेटा ! कल जो हाथ मुझे जिंदा जलाएंगे उन हाथों में मैं आज दूध-भात रख रही हूं। अगर तुम मर्द इस प्रथा को तोड़ सकते हो तो तोड़ो। मां को जिंदा जलाने की  यह परंपरा तुम्हारे युग में न हो बेटा !"

चाचा चुल्हे के पास बैठकर आंसू पोंछते रहे, बोले कुछ नहीं।

 

दो

 

तेरह दिन काजक्रिया में बीत गए।

धीरे धीरे लोग गम को भुलाने लगे।  चाचियां और भाभियां भी  शांत होने लगीं। पर मेरे  मन में अग्नि अ भी धधक रही थी। हर रात मैं सपने में मां को देखता और मां कहती- "बेटा ! तू चाची जैसा कहे वैसा ही करना। अब वही तेरी मां है।" और चाची के कहे वे शब्द रहरहकर मेरे कान में गूंजते रहते।

काजक्रिया के खत्म होने पर मुझे बहुत सी मुश्किलों ने आ घेरा। मां-पिताजी के न होने पर सौतेले भाई सब सामान उठाकर ले गए। मुझे भी अपने साथ ले गए। उन तेरह दिनों में तो चाची ने मुझे मां जैसा ही प्यार दिया, परंतु मैं सदा चाची के साथ तो नहीं रह सकता था। भाई-भाभियों का व्यवहार अच्छा नहीं था। अपने से बड़े भतीजे मुझे हरदम नीचा दिखाते रहते थे।  मां के मर जाने के पन्ध्रह दिन बाद से मैं फिर जंगलों मे मवेशी चराने के लिए जाने लगा।

मेरा ध्यान मवेशियों की तरफ बिलकुल नहीं जाता था। आंखों में जब देखो तब चिता में जिंदा औरत के जल जाने के दृश्य घुमते रहते थे। नीचे नदी किनार में आसपास के गावों से दो चार दिन में एक बार मुर्दे लाए जाते थे। मैं हरदम वही दृश्य देखता रहता। मुझे वह सब देखकर पीड़ा होती थी।

एक दिन जंगल में ही शाम घिर आई। मवेशी खुद व खुद दूसरे झुंडों में मिलकर घर की तरफ चल दिए थे पर मैं उन्हें जंगल में ढूंढने लगा था। ढूंढ़ते ढूंढ़ते मैं नदी के एक तरफ चला गया पहाड़ के एक तरफ ढलान के पास खोह में आग की लपटें दिखाई दीं। बदन में सनसनी फैल गई। जब अंधेरा गहरा होने लगा तो मुझे भी जंगली जानवरों(बाघ, चीते) से डर लगने लगा। जंगल को पार कर गांव पहुंचने के लिए करीब एक घंटे की चढाई चढ़नी होती थी।

उस खोह में जलती हुई आग की तरफ मेरा खींचा चला गया। एकबार लगा कि उधर हो आऊं पर फिर सशङ्कित बना कहीं बनझाँक्री (जंगल का ओझा)या कोई भूतप्रेत न हो। फिर भी धीरे से खोह के करीब जाकर झांककर देखा तो एक नंगा आदमी दिखाइ दिया जो आग में कुछ पकाने की कोशिश कर रहा था। मैंने सोचा जंगली आदमी है और वहां से लौट गया।

देर रात से घर पहुंचा। मवेशी खो गए थे। इसलिए फिकरमंद था और डर भी रहा था। लेकिन मवेशी तो अपनी-अपनी जगहों पर जम चुके थे। मवेशी के साथ मुझे नदेखकर बड़े भाई मुझे ढूंढ़ लाने के लिए मशाल तैयार कर रहे थे।  मेरे वहां पहुंचने पर सब के चेहरे में खुशियां लौट आईं। मैंने उन्हें बताया कि मैं खोए हुए मवेशी ढूंढ़ने में लग गया था।

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मैंने कल रात जो भी देखा था उससे मुझे कुतूहल हो रहा था।  मैं मवेशियों को जंगल में ही छोड़कर धीरे से खोह की तरफ बढ़ा।  खोह के नजदीक पहुंचकर अंदर झांककर देखा। छोटे से खोह में एक बड़े से पत्थर ने छतरी का काम किया था। एक तरफ दीवार के पास कोई लुढ़का हुआ था। पास जाकर देखा तो लगा कोई आदमी है। देखा वह निर्वस्त्र था। और नजदीक जा पहुंचा, मैं कुछ डरा हुआ था और बदन भी कांप रहा था।

मेरी सारी होशियारी के बावजूद एक पत्थर थोड़ा सा लुढ़क गया जिसमें मेरा एक पैर था। सोया हुआ वह प्राणी अचानक उठ खड़ा हुआ। आवाज से मैं भी चौंक गया था। उस प्राणी को देखते ही मैं डरकर चिल्ला उठा। मेरे चिल्ला उठने पर वह भी डर गया। मैंने लड़खड़ाते हुए पैरों से भागने की नाकाम कोशिश की। वह प्राणी भी मेरे पास आकर मुझे नजदीक से देखने लगा। मुझे लगा मैं सपना देख रहा हूं।

थोड़ी देर बाद मैं थोड़ा सहज हुआ और पाया की वह प्राणी अब भी  मुझे एकटक देख रहा है। उस प्राणीको देखतेदेखते मेरे आंखों से आंसूंओं की धारा बहने लगी, गला बैठ गया, मैं कुछ बोल नहीं पाया। मेरे सामने मेरी मां निर्वस्त्र खड़ी थीं। मैंने मां को  उसी अवस्था में देखा जिसमें वह सती होने के लिए चली थीं। पर मैं जो देख रहा था, वह तो सच था, न वह कोई भूत था न मेरा सपना। बिनबोले जब वह मुझे एकटक देखती रही, तब मैं अपनेको रोक नहीं पाया, और उनकी बाहों में चला गया। मैंने उन्हें झकझोरा और देखा धीरे से व होश में आ रही हैं।

बहुत देर बाद उन्होंने मुझे खुद बाहों में ले लिया और फिर जोर से रोने लगीं। लगा उनकी रूलाई से सारा जंगल थर्रा जाएगा। मेरी मां मुझ पर चुम्बनों की वर्षा करने लगीं और अपनी छाती से लगा लिया। रोते रोते बहुत व़क्त बीत चुका था। हम थककर बेहाल थे।

मैंने हैरान हो उन्हें पूछा - "मां ! आपको तो जिंदा जलाया गया था। फिर कैसे बच गयीं ?"

मां अपनी दुःखभरी कहानी सुनाने लगीं- "जब मुझे आग जलाने लगी और मैं धुएं से परेशान होने लगी तो मैंने घबराकर पानी में छलांग लगा लिया। जल की धारा ने मुझे कुछ नीचे तक बहाया। फिर मैं तैरकर किनारे पर आ गई। चारों ओर घुप अंधेरा था, मैंने ऊपर देखा लोग चिता को ठोंक रहे थे। नदी के ठंडे पानी से मेरा बदन जम सा गया था। अंधेरा तो था ही। मुझे इस बात की खुशी हो रही थी कि मैं जिंदा बच गई, मन में उनके प्रति आदर था जो मेरी छलांग को अनदेखा कर गए थे। जब सब शवयात्री चिता की आग बुझाकर चले गए तो मैं उस घने जंगल में अकेली रह गई। वे तो मुझे जिंदा जलाकर मार गए थे, पर इधर मैं जिंदा थी।  फिर रातभर एक पेड़पर चढ़कर बैठ गई। सुबह ऊठकर सुरक्षित स्थान तलाशते हुए इस खोह में आ गई।"

मां को जिंदा देखकर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। फिर मां को निर्वस्त्र और उस घने जंगल में छोड़ते हुए मैं व्यथित हो गया। मां फिर मुझे समझाने  लगीं-"बेटा यह बात किसी को नहीं बताना और अब इधर इस तरह से मत आना। मैं जितने दिन जिऊंगी इसी तरह जिऊंगी। कहीं कोई चीता मुझे मार कर खा भी सकता है। पर बेटा जीवन में कभी हिम्मत नहीं हारना, हमेशा जतना, हारना कभी नहीं बेटे, संघर्ष करते रहना। "

पर मैं मां से एकमत नहीं हो सका। मैंने उन्हें बताया- 'कहीं ऐसे भी जिया जाता है ? मैं आपके लिए कपड़े और खाने के लिए कुछ ले आता हूं।' और मैंने उन्हें बचन भी दिया कि मैं किसी को कुछ नहीं बताऊंगा। फिर मैंने उन्हें यह जगह छोड़कर कहीं और चले जाने की बात कही।

उस दिन शाम को मैंने मवेशियों के वक्त रहते ही उनके ठिकानों में पहुंचा दिया। चारा डालकर मैं चाचा के घर की तरफ चल दिया। मैंने घर में बता दिया था कि मैं आज उधर ही रहूंगा।

मुझे उस वक्त वहां देखकर चाची ने मुझे पूछा कि माजरा क्या है।

चाची को देखते ही मेरी आंखों में आंसूं भर ए। चाची ने मुझे पास बुलाकर कहा-"मां की याद आ रही है क्या ? आजा मेरे पास!" और मुझे वो अंदर ले गईं।  चाची के अलावा सब खाना खा चुके थे। जो खाना बचा था उसे मैंने और चाची ने बांटकर खाया।

खाना खा चुकने के बाद मैंने आंसूं पोंछते हुए कहा- "चाची आज मुझे तुम सुलाओ न।"

चाची ने प्यार भरी नजरों से देखा और बांये हाथ से आंसू पोंछते हुए कहा-"अच्छा बेटा ! मेरे साथ ही सोना।"

दिनभर के काम से थके हारे लोग सोने के कुछ देरबाद ही खर्राटे भरने लगे थे। चाची भी नींद में थीं। पर मेरी आंखें बंद होने का नाम नहीं ले रही थीं। मैं चाची को वह बात बताने के लिए बेचैन था और डर भी  रहा था कि चाची उस बात को कैसे लेंगी।

हिम्मत करके चाची को जगाया। धीरे से चाची के कान में कह दिया जो कुछ हुआ था । मेरी बात सुनकर चाची ऊठकर बैठ गईं। बत्ती जलायी फिर एक लोटा पानी पी गईं। वे पसिने से तर थीं और लंबी-लंबी सांसे ले रही थीं।

मैंने उन्हें कहा- "चाची ! कल आप अपने पुराने कपड़े दे देना। मैं मां को पहुंचा दूंगा।"

चाची ने कहा- "मैं भी तेरे साथ जाऊंगी बेटे । मुझे भी साथ ले चलना।"

इतनी खुशी हुई कि लगा दिल गले से होकर बाहर निकल आएगा।

"पर चाची ! मां ने कहा है कि यह बात किसी को बताना नहीं है। मां ने ऐसा ही कहा है।"

"हां ऐसी बात भी किसी को कहते हैं क्या ? किसी को मालूम पड़ा तो फिर तेरी मां को जला देंगे।"

सबेरे ऊठकर मैं बड़े भैया की घर के तरफ चल दिया। खाना खाने के बाद सदा की भांति मवेशियों के लेकर जंगल की तरफ चल दिया। घर के नीचे पानी के नाले में चाची मेरा इंतजार कर रही थीं। उन्होंने मुझे एक गठरी थमा और कहा- "मैं उस जगह को जानती हूं। मैं कुछ देर बाद घास काटने के लिए उस तरफ आऊंगी। मां को कहना मेरा इंतजार करे।"

मैंने शर हिला कर मंजुरी दे दी।

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मां पेड़के पत्तों से अपने को ढके हुए थीं। कल जो मां निर्वस्त्र और विक्षिप्त अवस्था में थीं आज  उनमें थोड़ा बदलाव आ गया था। वे कुछ सजिंदा थीं पर लज्जा और शोक से दबी हुई लग रही थीं।

मवेशियों को जंगल में ही छोड़कर मैं लोगों से बचते बचाते वहां पहुंचा।

मां ने मुझे ऐसे देखा जैसे पहली बार देख रही हों। इस हाल में भी उन्हें शायद मेरा सहारा मिल गया था।

 मैंने जल्दी से गठरी खोलकर मां के आगे रख दिया। गठरी  में  साड़ी, ब्लाउज, कमरबंद और ओड़नी जैसे कपड़े थे। उनके मध्य में एक कटोरी खीर थी जिसे कपड़े से बांधा गया था। वह सब देखकर मां बालक की भांति खुश हुईं और अगले ही पल उनके चेहरे पर विशाद की छाया दिखने लगी। वे भावुक बन गईं थी। उन्होंने देर तक अपने आसूंओं को बहने दिया।

मां की हालत देखने लायक तो थी नहीं। मैं बाहर निकलकर नीचे बहती तमोर नदी की धार को देखने लगा। नदी के पानी में बबूले ऊठ रहे थे। लगा उसी पानी के बहाव के साथ इतनी दूर चले जाएं मां के साथ कि कोई अपने कहे जानेवाले लोग कभी न देख सकें।

मां ने पहले कपड़े पहने। मैं ने फिर उसी सुन्दर मां को देखा जिन्हें मैं पहले देखा करता था। न जाने कितनी दिनों की भूखी थीं। पहले एक पत्ते में मेरे लिए खीर अलग करके बाकी खीर जल्दी से खा गईं। मैं उनके खाने के क्रम को देखता रहा। वे ऐसे खा रही थीं जैसे उन्हे यह सब पहली बार मिला हो। आह ! मेरी मां !!

जब मैंने कहा कि चाची ने यह सब भेजा है तो मां चौंक गईं। पिताजी के निधन के पहले चाची और मां में बनती नहीं थी। कभी कभार कहासुनी भी हो जाती। मां कहती थीं- "अपनी उमर से बड़ी देवरानियों के साथ निभाया नहीं जा रहा है। काश ! यहां से कहीं दूर जा कर बस सकते।"

पिताजी कहते थे- "अपनों को छोड़कर इस उम्र में मैं जवान बीवी र इस बच्चे को लेकर कहां जाऊं ? इधर बड़े बच्चे भी तो हैं। आखिरकर यह पैत्रिक जगह भी तो है।"

पर आज वही देवरानी के उपकार देखकर मां को शायद हैरानी हो रही थी। मैंने उन्हें सब बतलाया कि चाची ने किस तरह पिताजी की मौत के बाद मुझे प्यार किया था।

मैंने उन्हें बताया- "मां, हमें अब यहां से बहुत दूर चले जाना होगा। परदेश जाना होगा। वहां पहुंचना होगा जहां हमें कोई न पहचान सके। मैं किसी के यहां नौकर हो जाऊंगा और आपको सहारा दूंगा। मवेशियों को चराना, घास काटना, जो भी काम हो मैं कर सकता हूं। मां आपको मैं जंगली आदमी की तरह इस जंगल में  एक रात भी  नहीं  छोड़ सकता।"

मां ने कुछ नहीं कहा।

हम चाची का इंतजार कर रहे थे।

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नदी के उसपार शवयात्रा की शंखध्वनि सुनाई दी। एक ठंडी लहर भीतर तक दौड़ गई। ध्यान से देखा।  शवयात्री  एक शव को बरगद-पीपल की परिक्रमा करवाकर नीचे नदी किनार की ओर को ला रहे थे।

शवयात्री के नीचे आने पर देखा लाश के आगे सती भी चल रही थी। यह देखकर मैं और मां डरके मारे कांपने लगे। मैं मां क बाहों  में चला गया। मां ने भी मुझे भींच लिया। वे लोग नदी के उस पार थे और दूर थे। उनकी बातें तो हम सुन नहीं सकते थे पर जो कुछ हो रहा था उसका अर्थ हमें अच्छी तरह मालूम था।

मां ने कहा- "बेटा ! व सती आज बच नहीं सकती, अभी तो रात होने में बहुत देर है।"

देखते देखते शवयात्री नदी किनार में जमा हो गए।  रास्ते से ही लकड़ी ढोते हुए आए लोगों ने पल भर में ही चिता तैयार कर दिया। ब्राह्मण सती की व्यवस्था करने लगे। दिन धीरे से ढल रहा था। नियमानुसार पहले सती को चिता के एक ओर पलथी मारकर बैठाया गया।  उसके बाद सती क गोद में लाश का शर रखा गया।

शायद उनका बड़ा बेटा हो, एक आदमी ने लाश के मुंह पर अग्नि दी। वह कुछ दूर गया और रेत में ढेर हो गया।  लोगों ने उसे उठाकर पानी में डूबोया।  शवयात्री कुछ दूर एक जगह पर जमा होकर बैठे थे। वे लोग उठकर इधर उधर दौड़ने लगे। क्यों वे लोग दौड़ रहे हैं हम नहीं जान पाए और उसी तरफ देखने लगे जिधर ज्यादातर लोग दौड़ रहे थे।

दूर....दूर....। रेत में एक निर्वस्त्र और खुले बालोंवाली औरत नदी के धार के समानांतर नीचे की तरफ दौड़ रही थी। वह सती थी और न जाने कब चिता से छलांग मारकर दौड़ रही थी। शायद शवयात्री बेहोश हुए बेटे की देखरेख में लग गए थे और उसे चिता से कूद पड़ने का मौका मिला था

शोर मचाते हुए कुछ बलिष्ट आदमी  में उस औरत के पिछे दौड़ पड़े। एक आदमी ने पत्थर मारा जो औरत को नहीं लगा। दूसरे ने भी वही किया - वह भी नहीं लगा। जो सबसे नजदीक पहुंच गया था उसने जोर से पत्थर मारा जो औरत के पीठ में लग गया। औरत गिर गई और घुटने के बल ऊठने की कोशिश करने लगी। वह ऊठ भी नहीं पाई थी कि दूसरा पत्थर उसके शर पर आ लगा। फिर भी उसने रेत में दौड़ लगाना जारी रखा। पर दौड़ना उसकी सामर्थ्य के बाहर था। वह रेत में गिर गई और तडपने लगी। तीन-चार आदमियों ने उसे ऊठाकर फिर चिता में लाकर पटक दिया। वह तड़पती रही और जलती रही। लोग देखते रहे।

मुझे पकड़नेवाले हाथ ढिले पड़ गए। मैंने देखा मां बेहोश हो चुकी थी।

पास ही मां ने मिट्टी कुरेदकर एक छोटा सा कुवां बनाया था। मैं उसी कुवें से एक पत्ते में पानी लाकर उनपर छिड़कने लगा।  कुछ देर बाद उन्होंने आंखें खोली। सी वक्त पास ही से कुछ आवाजें आईं। एक आवाज चाची की थी- "पापी ! दुष्ट ! बुरा हो उनका। एक अबला को मारकर चिता में झोंक रहे हैं। उनके हाथों में कीड़े पड़ें। उन्हे कुष्ट हो जाए। उनकी औरते न हों, वे निसंतान हों !"

चाची के साथ चाचा भी आए थे। चाचा को देखकर मेरा बदन डर से कांपने लगा। मां भी नीली पड़ गईं। मुझे पश्चाताप् हो रहा था बेकार में चाची को बात बताई। होंठ, मुह सुख गए। मुझे भयभीत देखकर चाची ने कहा- "बेटा, डरने की कोई बात नहीं है। चाचा कुछ नहीं करेंगे। वे तुम्हारा उद्धार ही करेंगे बेटा।"

चाचा क आंखों में आंसू थे। वे कुछ बोल नहीं पा रहे थे।

"यह नियम हम दो-चार लोगों के वश में नहीं है। इसमें दो-चार व्यक्तियों का भी दोष नहीं है। इसे मिटाने के लिए सबको एक होना होगा। जो कोई मर्द, जिसे अपनी पत्‍नी से प्यार हो उसे सोचना चाहिए, उसक मृत्यु के बाद पत्‍नी को सती न होना पड़े।" चाची अकेले बड़बड़ा रही थीं।

चाचा ने आगे बड़कर मां के पैर छोए। वे कुछ भी बोल नहीं पाए थे।

मां ने कहा- "कान्छी ! मैं अभागन क्या आशिष दे सकती हूं ? फिर भी तुम लोगों ने इतना किया है मेरे लिए। जब हमारे सुख के दिन थे तो हम एक दूसरे से झगड़ते रहे, तुम्हारे अंदर इतना निर्मल दिल है यह मैंने आज जाना। तुम्हारा कल्याण हो ! तुम जो सोचोगी वो पूरा हो। पति से आगे ही तुम्हारी मौत हो जिससे तुम्हें यह दिन देखना न पड़े। बेटे ज्ञानी बनें, तुम रिश्ते में तो मेरी देवरानी हो पर मेरी मां जैसी हो।  पूर्व जन्म में तुम मेरी मां थीं। अगले जन्म में भी तुम ही मेरी मां बनो।" मां भी ऐसा ही कुछ बड़बड़ाने लगीं।

चाचा कुछ नहीं बोले। चाची ने एक थैले से कुछ रूपये निकालकर मां को दिए और कहा- "जहां भी रहो, सोचसमझकर खर्च करना। खुद को मजबूत करो। आदमी को कभी  कायर, बातबात पर रोनेवाला नहीं होना है न ही किसी को वैसा बनाना है। जीवन के संघर्ष में अनेक परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है आदमी को। जो हार गया, वो मर गया। जो जीता वही सिकन्दर। निरीह, कमजोर और लाचार होना हारने के संकेत हैं।  महावत हाथी को क्यों उस तरह से हुक्म करता है? यदि हाथी महावत से न डरे तो उसक क्या मजाल ? जंगल के रास्ते से ही धरान निकल जाना। रास्ता तो तुम जानती हो। वर्षों से नमक ढोने में जिस रास्ते का इस्तेमाल किया है, वही तो है। कहते हैं धरान में काम बहुत मिल जाता है। मां-बेटे वहीं कुछ काम करके गुजारा कर सकते हो। नमक ढोनेवालों से पहचाने जाने का डर हो तो वहीं से भारत जाकर वीरगंज या नहीं तो आसाम की तरफ भी जा सकती हो। जहां भी पहुंचो, बेटे की अच्छी परवरिश करना।"

अन्त में चाचा ने कहा- "भाभी, परम्परा को तोड़ना जो कोई तैयार नहीं होता। जिसके परिवार में से कोई सती हुआ है तो लोग दूसरे के घर में भी वही घटना की पुनरावृत्ति चाहते हैं।  हमें माफ कर दीजिएका और सारे शवयात्रियों को भी क्षमा कर दीजिएगा। यह बात हम पतिपत्‍नी के अलावा किसी को मालूम नहीं है, और हम किसी से कहनेवाले भी नहीं हैं।"

मां ने चाची को बाहों में ले लिया। वे दोनों देर तक रोत रहीं बिदाई के वक्त मैं भ रुवांसा हो गया। चाचा ने मुझे कुछ सिक्के  दिए। मेरे शर पर हाथ रखकर उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया, और बिन कुछ बोले एक हाथ से आंख पोंछते हुए हमें बिदा किया।

तीसरे पहर चाचा-चाची से विदा होकर हम मां-बेटे जंगल के रास्ते संक्रान्ति बाजार की तरफ बढ़ गए।

ऊपर तामाङ बस्ती में पहुंचते पहुंचते शाम ढल चुकी थी। हमने पिछे मुड़कर देखा- नीचे दो पहाड़ों के बीच में से तमोर नदी अपने ही संगीत के साथ बह रही थी। वह एकपल के लिए भी रूकती नहीं दिख रही थी। लगता था जैसे उसे दक्षिण में किसी से मिलना है।

मुझे अच्छा लगा। मां के चेहरे पर भी जीवन की नयी कांति उभर आई थी ।

 

तीन

 

अंत में एक पैरा पढ़ नहीं पाया, क्योंकि अक्षर में छेद थे।

मालूम नहीं कब से मेर आंखों से आंसू बह रहे थे। टीवी का टेलिसिरियल भी खत्म होनेवाला था। बेटे दिपलेश ने मेरी तरफ इसारा करके कहा- "देखो पिताजी रो रहे हैं, रो रहे हैं , कुरी....कुरी...(शेम....शेम...)."

 पहले कभी कभार टीवी के दृश्यों से उनकी आंखें नम हो जातीं तो मैं उन्हे चिढ़ाने लगता। आज वह उसी का बदला ले रहा था।

सच ! मेरी आंखों से दो बूंद आंसू लुढ़ककर नीचे आ गए। मां, सीताजी और बाकी सबलोग भी हंसने लगे। कुछ देर बाद मां ने  बच्चों से कहा- "तुम्हारा यह बाप है न, किसी काम का नहीं है। छोटी मोटी बातें भी यह सह नहीं पाता। मर्द हो कर भी कहीं ऐसे रोते हैं ? पर यह बचपन की आदत है इसकी।"

मैंने मां की तरफ टकटकी बांधे देख रहा था। जितना उन्हें देखता, उतना ही आंसूओं का वेग बढ़ता गया। फिर मैं बाथरूम में ढुक गया। हाथ मुंह धोया और कुछ देर के लिए बाहर टहलकर आ गया। लगा दिल कुछ हलका हो गया है। टेलिसिरियल खत्म हो चुक। बच्चे टेलिसिरियल के क्लाइमेक्स(अंतिम दृश्य) के बारे में कुछ बोल रहे थे। पर मैंने उतना ध्यान नहीं दिया।

आज की मेरी रुलाई से सीताजी को हैरीनी हुई। व बारबार मुझे कुरेदने लगीं। पर मैं कुछ कह नहीं पाया। एक तरफ करवट बदलकर सो गया। नींद का बहाना करने लगा। आधी रात तक मैं सो नहीं सका। बाद में सो जाने पर भी कभी कभी चौंक कर उठ जाता।

सबेरे उठने पर भी मेरा दिल भारी था। दिन भी अच्छा नहीं गुजरा। लगा कहीं भार के तले दबा हुआ हूं। यूं तो मैं आदत से ज्यादा ही बोलनेवाला हूं पर उस दिन अपनी चुप्पी से खुद भी हैरान था। सबेरे सीताजी ने मेरी चुप्पी का कारण पूछा, पर मैं कुछ नहीं बता सका।

नाश्ता करके जब ऑफिस जाते वक्त मैंने सीताजी से कहा- "सीता ! आज इस झोले के मालिक आएं तो मेरे आने तक रोके रखना। उनसे कहना आज रात हमारे यहां ही रहें। उन्होंने इंकार किया तो झोला छिपाकर भी रोके रखना।"

सीताजी कुछ नहीं बोलीं। फिर मैं सीधा ऑफिस चला गया।

शाम को जब लौटा तो हृदय कुछ हलका हो गया था। मुझे अंगना में देखते ही कुछ मुस्कुराते हुए, कुछ लजाते हुए, उदासी ओड़े सीताजी ने कहा- "हमें पता चल गया है, आप कल रात क्यों रोए थे।"

मैं चुपचाप बैठक की तरफ बढ़ गया। पिछेपिछे सीताजी और मां भी आ गईं।

मैंने चुपचाप अपने झोले से एक प्रेमजड़ित तसवीर निकालकर पृथ्वीनारायण, त्रिभुवन, महेन्द्र और विश्वेश्वरप्रसाद कोइराला के तसवीर के मध्य लगा दिया। सीताजी और मां बहुत देर तक उस तसवीर को देखती रहीं और फिर मां ने पूछा-"बेटा ! यह किसकी तसवीर है ? क्यों इन बड़े आदमियों के बीच टांग दिया है तूने ?"

मैंने मां के चेहरे को ध्यान से देखा और फिर उस तसवीर को देखा।  मैंने मां से कहा- " मां ! इनका नाम चन्द्र शमशेर है। आज आप इन्हीं से प्राप्त आयु जी रही हैं, 2033 कार्तिक 2 से आज तक। सती प्रथा को अन्त्य करनेवाले महापुरुष यही हैं मां।"

मुझे लगा मेरी आंख