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साँप-सुख
वनवाटिका के एक बिंदू से साँप उठता है भोजन तृप्ति के लिए भोजन भोग के लिए।
व्याप्त हैं साँप बिलों में कोनों में
भूख बलवान कर देती है साँप को प्यास मतवाला कर देती है उसे
रात की आँखें देखती हैं अँधेरे की चिकनाहट से वह खिल उठता है
साँप का दिल है उसकी चाहत है
बुलाओ उसे तुम्हारे आँगन में तुम्हारे अंतस्थल में तुम्हारे तपोवन में
अनेकानेक शीर्षकों में अनुच्छेदों में वह कविताएँ लिखता है लयबद्ध गीत लिखता है
साँप आक्रमण है प्रत्याक्रमण भी है प्रहार है अपराध-बिंब भी है।
शून्य समय से जागकर साँप जब सपेरे के मंत्रकुंड में डूबता है
शून्य-आदि और शून्य-अंत के बीच साँप डोलता रहता है साँप-सुख की अनुभूति होती है।
मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी। |
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श्री मुकुल दाहाल जन्म विक्रमाब्द २०२२ को नेपाल के पूर्वी शहर शनिश्चरे में हुआ। वे कविताओँ को अपना दिल दे बैठे हैं और उनकी एक काव्यकृति प्रकाशित हैः सीमातीत सीमान्त। वे अङ्ग्रेजी जालपत्रिका पेनहिमालय (www.penhimalalaya.netfirms.com) का सम्पादन करते हैं और साहित्यसरिता (www.sahityasarita.org) के सहयोगी संपादक हैं। उन्हें वाणी पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया है। सम्पर्कः mukul.dahal@gmail.com , mukulnp@hotmail.com |