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कला और क्रांति

? कुमुद अधिकारी

 

आज भी प्रद्युम्न सदा की भाँति मेरे कमरे में आँधी की तरह दाखिल हुआ। मैं अपने आपमें खोया था जैसा की सदा होता आया है। कैनवासों से लैस कमरे में कूचियों के संग खेल रहा था। आज तैल रंग और कूचियों को तैयार कर प्रेमा को एक कुर्सी पर बिठा रखा था। आज मुझे उसकी निकलती हुई मुसकान को कैनवास में उतारना था। मेरा काम तक़रीबन पूरा हो चला था। प्रेमा के पीछे दीवार में लियोनार्दो दा भिन्ची की 'मोनालिसा' टंगी थी। इसी मोनालिसा में वर्षों तक उलझा हुआ हूँ। रंग, प्रकाश और छाया संयोजन के अलावा और भी कई पक्षों के अध्ययन के पश्चात् भी मैं उसकी रहस्यमय मुसकान को समझ नहीं पाया हूँ। अब तक मैं नाकामियत ही मेरा साथ दे रही है। हम कलाकारों के लिए या तो पूरी तरह मुसकुराता हुआ चेहरा उतारने में आसानी होती है, या तो सपाट चेहरा। भाव जितने आसान हों रंगों में ढालने उतनी ही आसानी रहती है। जटिल भाव के लिए, कूचियों के चुनाव से रंगों के संयोजन के साथ कैनवासों की क्वालिटी पर भी पूरा ध्यान रखना होता है। फिर कलाकारों के मनोभाव भी उतना ही प्रभाव छोड़ते हैं। पर मैं इन्हीं जटिलताओं में रमता हूँ। फिर भी मुझे मोनालिसा की मुसकुराहट ने कई दिनों से परेशान कर रखा है। यह थिम ही मेरे लिए चुनौतियों से भरा हो गया है। ऐसी ही चुनौतियों को स्वीकारने में ही तो कलाकार होने का सच्चा आनंद है। मेरे इस विशाल कला-कक्ष में कई सौ मोनालिसाएँ पड़ी हैं। मोनालिसा की उसी मुसकान को कैनवास में उतारने के लिए मेरी कई रातों की नींद हराम हो चुकी है। मोनालिसा की जैसी मुसकान मैं प्रेमा के पोट्रेट में नहीं उतार पाया तो क्या मैं कलाकार रहूँगा ? मेरा अपने आपसे अहम सवाल यही है।

प्रद्युम्न को कमरे में देखते ही प्रेमा उठ खड़ी हुई और कहने लगी – 'मेरा तो बदन ही अकड़ गया !' अरे ! अब मुझे ज्ञात हुआ, प्रेमा की मोनालिसा जैसी मुसकान कैनवास में उतारने के चक्कर में मैंने उसे एक घंटे से कुरसी पर बैठा रखा था। प्रेमा भी न ! कभी शिकायत नहीं करती। मेरी कला साधना को सच्चे मन से साथ दिया है प्रेमा ने। वह मेरी सच्ची सहयात्री है, कला में डूबनेवाली। जब भी मेरे कला-कक्ष का द्वार खुलता है, वह पचास मीटर की दूरी पर रहे अपने घर से सीधे आ पहुँचती है। पर आज वह मोनालिसा जैसी मुसकान ओड़कर कुरसी पर बिन हिले एक घंटे तक बैठी रही। । मैंने नयनों से उसे आभार व्यक्त किया। उसके होठों पर वही रहस्यमय मुसकान उतर आई। मैं अभी तक ताज्जुब में ही हूँ, कैसे वह अपने होठों पर ठीक वैसी ही मुसकान ला सकती है। पर यह बात तय है की उसकी वही मोनालिसा जैसी मुसकान ही मेरे लिए प्रेम की अभिव्यक्ति है।

'मैं जरा तुलसी-चाय लेकर आऊँ।' कहते हुए वह मेरे कला-कक्ष से बाहर चली गई। प्रद्युम्न कमरे के बीचोंबीच खड़े होकर चारों ओर निहार रहा था। वह जब भी यहाँ आता है, उसका पहला काम यही होता है। तकरीबन कमरे के बीच से ही वह एक चक्कर मारता है, शिर को तीस डिग्री के ऐंगल में ढालकर।

'क्यों प्रद्युम्न, जब देखो दीवारों की तरफ ही देखते हो। मेरी तरफ तो ध्यान ही नहीं देते ?'

'कैसी बातें करते हैं भैया ? आपकी तरफ ध्यान नहीं देता तो बारबार आपके यहाँ आता ही क्यों ? पर आपसे ज्यादा मैं पहले इन महान कलाकारों के प्रति नतमस्तक होना चाहता हूँ। इन्होंने विश्व को क्या कुछ नहीं दिया ? क्यों ?'

'ठीक कहते हो प्रद्युम्न। नहीं तो ये सब मेरे कक्ष में कैसे होते ? ये सब मेरे लिए प्रेरणा के स्रोत हैं, कलाकारों के दिल के धड़कन हैं। कौन इनके कला से अछूता रह सकता है ?'

फिर मैं भी प्रद्युम्न के साथ मेरे हो लिया। मेरे इस कक्ष की चारों दीवारों में तकरीबन छह फूट ऊपर तसवीरों की कतार है। पाब्लो पिकासो, माइकल एन्जेलो, भैनगॉग, दा भिन्सी, राफाएलो, लुइस ले नाइन, क्लाड गेले, निकोलस पोउसिन, टिटियन.....मकबुल फिदा हुसैन....होते हुए अरनिको, लैनसिं वांग्देल, सत्यजित रे, रवीन्द्रनाथ, अमर चित्रकार, किरण मानन्धर... आदि..आदि। इन में से कई तो मेरे समकालिन भी हैं। उनके कला के प्रति सोच और रवैया ही मुझे उनके प्रति नतमस्तक बनाता है। समकालिन होकर भी आदरणीय होना यों आसान तो नहीं है।

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कुछेक दिन पहले प्रद्युम्न आज ही की तरह मेरे कला-कक्ष में दाखिल हुआ था। उसने कहा था- 'भैया, मैं एक बिलकुल नई क्रांति की खोज में हूँ। मैं ऐसी क्रांति की तलाश कर रहा हूँ, जिससे अपने देश का कायापलट हो जाए। पर अबतक की पढ़ाई कुछ नहीं दे पाई है।'

'मुझे भी तो बताओ, कैसी क्रांति तलाश रहे हो।'

'मुझे मिलती तो मैं आपको जरूर बता देता। मैं ऐसी चीज़ ढूँढ़ रहा हूँ जो किसी को अब तक न मिली हो, नई हो और सहज हो।'

'अरे भाई, मुझे तो तुम्हारी बातें पहेली सी लगती हैं। मैंने तो अब तक जितनी भी क्रांतियाँ देखी हैं, वे या तो बंदूकों से की गई हैं या कलम से। तुम ऐसे भी अहिंसावादी हो, लिखते भी नहीं हो, कैसे क्रांति करोगे ?'

'भैया भी न ! भौतिक क्रियाओं, लिखने से या हिंसा से भरी हुई ही होती हैं क्या क्रांतियाँ ? लोगों को विचारों से भी तो बदला जा सकता है। लोगो के विचार में आमूल परिवर्तन आ गया तो आप इसे क्रांति नहीं कहेंगे क्या ?'

'वह तो ठीक है प्रद्युम्न। पर देखो, जितनी भी क्रांतियाँ हुई हैं, वे किसी न किसी विचार से प्रेरित ही हैं। वैचारिक परिवर्तन ला सके तो ठीक है। पर यह बात गौरतलब है की विचारों को लादा नहीं जा सकता। हर कोई ओसो, मार्टिन लुथर किंग या विन्सटन चर्चिल जैसे प्रखर वक्ता तो नहीं हो सकते न। इन हस्तियों जैसी प्रभावशाली प्रवचन कला आनी चाहिए और उसके ऊपर जो विचार दे रहे हो वह बिलकुल नया होना चाहिए।'

'भैया, मैंने भी इसे गंभीरता से लिया है। बच्चों का खेल नहीं है।'

'सच है, प्रद्युम्न वैचारिक क्रांति लाना बच्चों का खेल नहीं है। माओवादियों की तरह बंदूक से क्रांति तो की जा सकती है। पर तुम जानते ही हो, उन्हें भी बंदूक से कुछ नहीं मिला, वे लोगों के विचार में तब्दीली नहीं ला सके और हिंसा का रास्ता त्याग दिया। तुमने जो रास्ता चुना है, वह अति कठिन है, तुम ने ठान ली है, लक्ष में पहुँचो मेरी शुभकामनाएँ।'

'कोशिश तो करनी है न भैया। कोई चलता ही नहीं तो कहीं कैसे पहुँचेगा ? कहीं पहुँचने के लिए तो चलना चलना जरूरी है। यहाँ सवाल यह है की रास्ता कौन सा लिया जाए। मुझे दिशा तो मिल गई है, बस रास्ता ढूँढ़ रहा हूँ। आपके चित्र कहीं कोई रास्ता दिखा दें उसी के आस में आप के यहाँ आता रहता हूँ।

'मैं तुम्हारे कुछ काम आ सकूँ, यह तो मेरे लिए सौभाग्य होगा प्रद्युम्न।'

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आज प्रद्युम्न मेरी बड़ी बड़ी फाइलें पलट रहा है। ये फाइलें मेरे स्वतंत्र कला अध्ययन काल में जमा हुई हैं। मेरी अमूल्य निधि हैं। योरोप की पैंटिंग्स की एक फाइल पलटकर प्रद्युम्न पूछता है – 'भैया यह तो गुफा-पैंटिंग लगती है ?'

'हाँ है तो। यह पैंटिंग इसापूर्व 13000 की है और लाउकाउक्स फ्रांस की है। देखो तो उस पैंटिंग में घोड़े, गाय और बैलों को कितनी सजीवता ते दिखाया गया है। तुम जानते हो यह पैंटिंग किस तरह बनाई गई थी ?'

'नहीं, भैया !'

'उस वक्त पैंटिंग बनाने के लिए ब्रस नहीं थें। वे जानवरों की खोखली हड्डियों में रंग भरते थे और मुँह से फूँक मारते थे। यह पैंटिंग भी उसी तरह बनाई गई है।'

'अरे वाह ! अद्भूत ! हड्डियों से फूँककर भी इतने सजीव चित्र, वो भी उस वक्त !'

'प्रद्मुम्न, तुम फाइल देखते तो जाओ। तुम्हें और भी बहुत कुछ मिलना बाकी है।' इतना कहकर मैं उन कैनवासों को सम्हालने में लग गया जो मैंने कुछ हप्ते पहले तैयार किए थे। पता नहीं प्रद्युम्न कब चला गया था। मैंने प्रेमा को बुलाया और उसके सहयोग से काम में लग गया। प्रेमा उसी मोनालिसा जैसी मुसकान के साथ मुझे हाथ बंटाने लगी। मैंने क्रूयल्टी थिम में चित्र बनाए थे। कुछ दिनों बाद इन चित्रों की प्रदर्शनी लगनी थी । चित्रों को क्रमानुसार रखने में कुछ वक्त तो लग ही गया।

क्रूयल्टी थिम में पैंटिंग्स बनाने में मैंने बहुत सा वक्त खरचा किया था। पाँच साल से मैंने एक भी समाचार पत्र नहीं पढ़ा था। इसके पीछे एक बात थी। मैं चाहता था समाचार पत्रों में छपे फोटोग्राफ्स मुझे प्रभावित न करे। और फिर समाचार रेडियो से सुनकर ही पैंटिंग्स बनाने की सोच भी आगे आई। इन्हीं पाँच बरसों में सिर्फ रेडियो से समाचार सुनकर मैंने क्रूयल्टी थिम में बहुत सी पैंटिंग्स बनाई थीं।

'भैया आप की फाइलों से तो मैं इस तरह जुड़ गया कि छोड़ने का मन ही नहीं करता।' फिर हवा की तरह प्रद्युम्न कमरे में दाखिल हुआ।

'मुझे थोड़ा हैल्प करो प्रद्युम्न, उसके बाद ही तुम्हें फाइलें दूँगा।' मेरे कहने के साथ ही प्रेमा किचन की तरफ लपक चुकी थी। वह जानती थी, प्रद्युम्न जितनी बार आ धमकता है, उतनी ही बार उसे तुलसी चाय पिलानी पड़ती है।

'भैया, यह आदमी कौन है ? कहीं दिखा सा लगता है, फिर देखता हूँ, अजनबी सा भी लगता है। इसके चेहरे में क्यों इतना भय दिखता है ?'

'प्रद्युम्न, पूरी ट्रेसिंग हटाकर देखो तो जरा।'

'अरे ! यह तो मुक्तिनाथ अधिकारी हैं न ? जिनकी हत्या माओवादियों नें घुटनों के बल बिठाकर, हाथ पिछे बाँधकर, बहुत ही पाशविक तरीक़े से की थी। पर आपने तो इन्हें दूसरा ही रूप दे दिया भैया।'

'हाँ प्रद्युम्न, मैंने इन्हें कभी नहीं देखा। इनकी हत्या की तसवीर भी नहीं देखी। मैंने इस पैंटिंग में सिर्फ इन्हें मारने वालों की क्रूरता की झलक दिखाने की कोशिश की है।

'भैया, चित्र इतना कुछ बोलता है की मेरी तो घिघ्घी बँध गई है। मैं इनके चेहरे में वह त्रास देखता हूँ, जो शेर के मुँह में जा रहे हिरण में दिखाई देता है।'

'यहाँ मैं तुमसे सहमत नहीं हूँ, प्रद्युम्न। तुमने जो तुलना की है वह इस पैंटिंग से मिलती नहीं है। शेर के मुँह में जा रहे हिरण में जो त्रास दिखाई देता है, उससे इनके चेहरे का त्रास नितांत अलग है। तुम जानते हो, हिरण शेर का शिकार है और शेर का क्रोध उसके भोजन प्राप्ती तक ही सीमित है, अन्यथा शेर क्रूर हो नहीं सकता। और जो त्रास तुम हिरण में देखते हो वह भी स्वाभाविक मृत्यु का त्रास है। शेर और हिरण दोनों प्रकृति के अंग हैं। लेकिन इस पैंटिंग में विवेकशील कहेजानेवाले मनुष्य की क्रूरता की पराकाष्ठा है। आखिर यह हिंसा किसलिए ? इस से बड़ी विडंबना क्या हो सकती है ?

'चलिए चाय पिएँ।' प्रेमा वही मोनालिसा जैसी मुसकान के साथ आ गई। हमलोग चाय पीने लगे। इसके बाद फिर काम आगे बड़ गया।

और भी बहुत से पैंटिंग्स थीं क्रूरता थिम में। एक में मैंने नगरकोट हत्याकांड का चित्रण किया। यह कांड एक सैनिक जवान की सनक से मचा था। उसी तरह विर्तामोड़ की ट्राफिक पुलिस हत्याकांड, बेलबारी हत्याकांड, सैनिक हिरासत में माओवादियों को दी गई क्रूर यातना... जैसी पच्चीस पैंटिंग्स थीं। घरेलू हिंसा और अंधविश्वास से जुड़ी हुई दस पैंटिंग्स थीं। डायन के नाम स्त्री को पर मलमूत्र खिलाते हुए लोंगों की पैंटिंग्स भी दो थीं। सभी पैंटिंग्स को क्रमानुसार रखने के बाद प्रद्युम्न चला गया और मैं प्रेमा के साथ कूचियों की सफाई की तरफ लग गया।

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'प्रद्युम्न तुम्हारी तलाश कहाँ पहुँची ?'

'भैया, अभी-अभी इसापूर्व में रोम हुई दासों की क्रांति पढ़कर खत्म की है। और भी बहुत कुछ पढ़ना बाकी है। बीच में ही कहीं कुछ मिल जाए, इसलिए आपकी पैंटिंग्स देखने चला आता हूँ।'

'स्पार्टाकास थे न जिन्होंने रोमन दासों का नेतृत्व किया था और सैनिकों को पराजित किया था ?'

'हाँ भैया, पर आप तो कलाकार ठहरे, फिर यह इतिहास ?'

'प्रद्युम्न तुम भुल गए क्या, मैं भी इतिहास का विद्यार्थी रहा हूँ कभी।' मेरे इतना कहने से प्रद्युम्न शर्म से लाग हो गया और फिर योरोपीय कलाकृतियों की फाइल पलटने लगा।

'भैया यह "गेहूँ का खेत और साइप्रस का पेड़" किसकी कलाकृति है ?'

'भिन्सेन्ट विलेम भैनगॉग की है।'

'इसके बारे में कुछ और भैया ?'

'तुम्हें मालूम है प्रद्युम्न, भैनगॉग ने अपने सक्रिया कला-सृजना काल में ज्यादातर लैंडस्कैप बनाए। उन्हीं में से एक है यह- गेहूँ का खेत और साइप्रस का पेड़। वे पोस्ट इंप्रैसनिस्ट कलाकार थे और उन्होंने इंप्रैसनिस्टों की भाँति सीधे प्रकृति झलकाने वाली कलाकृतियाँ नहीं बनाई। फिर उनकी कलाकृतियाँ से बाद में ऐक्सप्रेसनिस्टों को प्रेरणा मिली। जरा गौर करके देखो तो... दिखती तो प्राकृतिक है, फिर भी कितनी अलग..।'

'सच है, भैया पैंटिंग्स को सही तरीके से समझना बहुत कठिन है।'

'प्रद्युम्न, मैं तो सोच रहा था तुम्हें मैं अपनी नई पैंटिंग दिखाऊँ। शायद तुम्हारी नई क्रांति की तलाश में कुछ मिल जाए।'

'जरूर भैया, क्यों न मैं ही चाय बना लाऊँ ?'

'नहीं नहीं।' कहते हुए मैंने प्रेमा की तरफ ईसारा किया और प्रद्युम्न को पेज नं ५५ पलटने के लिए कहा।

प्रद्युम्न कुछ देर तक ध्यान से उस पैंटिंग को देखता रहा और कहा – 'थोड़ी बहुत तो समझ आ गई है, पर भैया जरा और कुछ बतलाइए न।'

'पहचाना किसकी पैंटिंग है ?'

'नहीं तो ! भैया अभी मैं सिर्फ पैंटिंग्स देखकर कलाकार पहचान सकने वाला नहीं हुआ हूँ।'

'यह "गेर्निका" शीर्षक की कलाकृति है और पाब्लो रुइज वाइ पिकासो की है।'

'भैया यह कलाकृति तो घोर पीड़ा दर्शाती है।'

'तुमने ठीक कहा। तुम्हें मालूम है, स्पैनिस गृहयुद्ध के दौरान २६ अप्रैल १९३७ को जनरल फ्रान्को का समर्थन करते हुए जर्मन हवाइजहाजों ने  गेर्निका के बास्क शहर में भीषण बमबारी की थी। उसके बाद बीस दिन लगाकर पिकासो ने यह पैंटिंग बनाई थी।'

'इसलिए यहाँ लड़ रहा योद्धा भी है न भैया ?'

'हाँ, पैंटिंग वही बमबारी की घटना हूबहू तो नहीं दर्शाती पर अपने क्रोध और आवेग को पिकासो नें बिंबों के माध्यम से प्रस्तुत किया है। साँड़, मृत्युशय्या में पड़ा घोड़ा, योद्धा, मृत बालक और उसकी माँ, जलती हुई भवन में फँसी महिला, फिर कोई दौड़कर आता सा.... इन सब बिंबों ने कलाकृति को उत्कृष्ठ और अमर बना दिया है। जरा गौर करके देखो प्रद्युम्न, युद्ध की विभीषिका कैसे देखते हो ?'

'अद्भूत ! अद्भूत !!'

'क्या अद्भूत प्रद्युम्न ?' कहते हुए प्रेमा तुलसी चाय लेकर कमरे में दाखिल हुई। मैंने उसके चेहरे को देखा। फिर वही मोनालिसा जैसी मुसकान...।

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'भैया आज मैं फ्रांसिसी क्रांति, दूसरा विश्वयुद्ध और रूस की अक्तूबर क्रांति के बारे में पढ़कर आया हूँ। फिर भी मैं जो ढूँढ़ रहा हूँ वह नहीं मिल रही। आप के यहाँ आकर जब कलाकृतियों को देखता हूँ तो लगता है कि कुछ मिल गया। फिर घर जाता हूँ, कुछ खो सा जाता है। क्रांति की किताबों में शिर खपाता हूँ, ढूँढ़ता रहता हूँ।' प्रद्युम्न आते ही शुरू हो गया।

'अच्छा !' मैं थोड़ा हँस देता हूँ। आज जब प्रद्युम्न आया तो मैं अपने थिम "द अल्टिमेट ट्रुथ" के पैंटिंग्स सम्हालने में लग गया था।

'आज फिर थोड़ा हैल्प करो प्रद्युम्न। तुम्हे शायद अच्छे ही लगेंगे।

'क्यों नहीं भैया ?' कहते हुए प्रद्युम्न मुझे सहयोग करने लगा।

इस थिम मैंने जोड़ी पैंटिंग्स बनाए थे। पहला चित्र वह था जिसमें बिग बैंग से ब्रम्हांड की निर्माण के समानांतर एक माँ से बालक का जन्म दर्शाया गया था। बिगबैंग के प्रकाश के सादृश्य माँ के चेहरे की आभा थी। इस थिम की पैंटिंग्स को बनाने में तकरीबन चार महीने लगे थे।

'क्रूरता' थिम की चित्रों की सफल प्रदर्शनी के बाद मैं उत्साहित हो गया था। नए थिमों की तलाश में जब मैं किताबें पढ़ रहा था तो स्टीफन हॉकिंग की 'अ ब्रीफ हिस्टरी ऑव टाईम' हाथ लग गई। इस किताब में बिग बैंग और बिग क्रंच  के बारे में पढ़ने के बाद मैंने नया थिम लिया 'द अल्टिमेट ट्रुथ'। इस थिम में ब्रम्हांड की शुरूवात बिग बैंग को मनुष्य के जन्म और बिग क्रंच को मृत्यु से तुलना की गई है।

'भैया मैं जरा यह पहला चित्र थोड़ी देर देखूँ।' प्रद्युम्न कहने लगा। मैंने दरवाजे की तरफ नजर दौड़ाई। प्रेमा उसी मोनालिसा जैसी मुसकान के साथ हमें ही देख रही थी। वह समझ गई और किचन की तरफ चली गई। प्रेमा अब चालाक बन गई है, प्रद्युम्न की बोली से ही उसे पता चल जाता है की कब चाय बनानी है।

हम फिर पैंटिंग्स को क्रम देने लगे। बिगबैंग से शुरू हुई शृंखला बिग क्रंच में जाकर समाप्त हो गई थी। इस सीरीज में पंद्रह पैंटिंग्स थीं। क्रम देने के बाद प्रद्युम्न के चेहरे पर अनूठी आभा खिल उठी।

प्रेमा तुलसी चाय लेकर आचुकी थी। चाय की चुसकी के साथ प्रद्युम्न फिर युरोप की कला की फाइल पलटने लगा। मैंने कहा – 'प्रद्युम्न, जरा पेज न. ६६ देखो तो।'

'भैया यहाँ तो एक नग्न युवती और एक कपड़े पहनी हुई युवती है।'

'हाँ, तुम जानते हो, यह चित्र क्या बिंबिंत करता है ?'

'इनके चेहरे के भाव से तो प्रेम ही दिखाई देता है, पर कौन कैसा प्रेम दिखा रही है, पता नहीं चला।'

'गौर से देखो।'

दश मिनट तक भी प्रद्युम्न कोई जबाव नहीं दे पाया तो मैं ही कह बैठा – 'देखो प्रद्युम्न, यह पैंटिंग भेनिस के कलाकार टिटियन की "सैक्रेड एंड प्रोफेन लव" है। इस में कपड़ेवाली युवती भौतिक धरातलीय प्रेम दर्शाती है जबकि नग्न युवती उससे ऊपर की विशुद्ध प्रेम। कुछ समझे ?'

'अद्भूत ! अद्भूत !' कहते हुए प्रद्युम्न वैसे ही बाहर चल दिया जैसे आया था।

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उसके लगभग चार महीने बाद प्रद्युम्न मेरे कलाकक्ष में आँधी की तरह दाखिल हुआ। मैं तो उसकी अनुपस्थिति से झल्ला चुका था, प्रेमा भी चिंतित हो गई थी।

'क्यों प्रद्युम्न चार-चार महीने कहाँ रहे ?'

'क्या करूँ भैया, क्रांति और आंदोलनों की किताबों में ही शिर खपाता रहा हूँ। आपके यहाँ आने ही वाला था, लेकिन कुछ किताबें लेनी थीं, इसलिए बाहर चला गया था। दो महीने बाहर ही रहा। अब रहा नहीं गया तो आ धमका हूँ।'

'बहुत अच्छा किया। मैं भी तुम्हारे न होने से खो सा गया था।' प्रेमा भी भीतर आ चुकी थी। कहने लगी – 'क्यों प्रद्युम्न जी। खबर भी नहीं और इतने दिन नदारद ?'

'माफ कीजिएगा प्रेमा जी। अब से ऐसा नहीं होगा।' उसके कहने के साथ ही प्रेमा किचन की तरफ चल दी। और मैं यह सोचने लगा की कब मोनालिसा की जैसी इसकी मुसकान को कैनवास में उतार पाऊँगा।

'भैया कुछ नया है कि नहीं ? या पुरानी फाइलें ही पलटूँ ?'

'नहीं, एकदम नया है। तुम इसको जरूर पसंद करोगे। तुम्हारी तलाश को कुछ मदद हो सकती है। पर कह नहीं सकता तुम कहाँ तक पहुँचे हो ?'

'जरा थिम तो बताइए।'

'ऑनेस्टी ।' मैंने सीधे उसकी आँखों में देखकर कहा।

'थिम तो नया है, लेकिन मैं आपकी पैंटिंग्स का अंदाजा नहीं लगा पा रहा हूँ।'

'उसकी चिंता क्यों करते हो ? मैं तो तुम्हें दिखाने ही वाला हूँ। चलो उस कोने की ओर।' मैं उसे खींचते हुए कोने में ले गया।

इस सीरीज में मैंने ऑनेस्टी को कंट्रास्टिंग आईडियाज के जरिए प्रस्तुत किया है। रंगों का चुनाव भी ज्यादा कंट्रास्टिंग ही है। सीरीज का पहला चित्र है – एक आलीशान महल जिसके चारों ओर गड्डों से भरपूर रास्ते थे और उसीके साथ थे गंदे नाले। शीर्षक – आशीयाना।

'यही है मेरी ऑनेस्टी सीरीज की पहली कलाकृति।'

कुछ देर गौर से देखने के बाद प्रद्युम्न बोल उठा- 'इस महल के नेम प्लेट में तो इंजिनियर लिखा है। यह घर या तो इंजिनियर का है, या कोई प्रसिद्ध इंजिनियर द्वारा बनाया गया है।'

'हाँ, यह घर इंजिनियर का ही है। महल के चारों ओर जो रास्ते देख रहे हो न जिसमें गड्डे ही गड्डे हैं, वे भी उसी इंजिनयर ने बनाए हैं। गड्डों से भरे रास्तों और गंदे नालों की बीच एक आलीशान महल। सुंदर फिर भी कुरूप।'

मैंने देखा प्रद्युम्नका चेहरा अचानक चमक उठा है। वह अनूठी आभा से दीप्त दिखाइ दिया। फिर मैं उसे दूसरी कलाकृति दिखाई। यह भी वैसी ही थी। एक साजो-सामान से भरी बड़ी सी बैठक थी जिसमें एक भिखारी चिथड़े कपड़ों में टी.वी. देख रहा था।

'भैया, यह कैसा कंट्रास्ट ?'

'हाँ प्रद्युम्न मैं इस पैंटिंग के बारे में सिर्फ दो ही बातें बताना चाहता हूँ- उस आदमी की चेहरे की आभा और उसके कपड़े उसके विचार हैं और कमरे के सामान यथार्थ। अब आगे ... तुम खुद समझो।

मैं समझ नहीं पाया प्रद्युम्न ने ऑनेस्टी की पैंटिंग्स को किस तरह लिया है। विचारों का विरोधाभास तो अपने आप में विवादास्पद है ही। हर आदमी की एक निश्चित दृष्टि से ही कलाकृतियों को देखता है, जो उसीके विचार की उपज है।

'भैया मुझे मिल गई। मुझे मिल गई।' प्रद्युम्न अचानक चिल्ला उठा।

'क्या मिली भाई तुम्हें ?'

वह गंभीरता की चादर ओढ़कर कहने लगा – 'भैया मैंने मेरी तलाश के लिए क्या कुछ नहीं पढ़ा। चीनी क्रांति से लेकर दक्षिण अफ्रिका की रंगभेद विरोधी आंदोलन, महात्मा गांधी की सत्याग्रह से लेकर सुंदरलाल बहुगुणआ की चिप्को आंदोलन। ..... राणा शासकों के अत्याचार से लेकर सात, सत्रह और छत्तीस साल में जो आंदोलन हुए सब पढ़ डाला। कहीं कुछ नहीं मिला। लेकिन आज आपकी कलाकृतियों में मुझे वह चीज मिल गई जिसकी मुझे तलाश थी।

'सीधे कहो न भाई, क्या चीज मिली तुम्हें।'

'आप मुझे सब पैंटिंग्स दिखाएँ, उसके बाद ही कहूँगा।' ऐसा कहने के बाद मैं उसे दूसरे पैंटिंग्स दिखाने लगा। दूसरी कलाकृति में कम्बैट ड्रेस में परेड कर रहे बूढ़े थे, जिसके बैकड्राप में उगता सूरज था। ऐसे ही पूरी पंद्रह कलाकृतियाँ देखने के बाद प्रद्युम्न फिर आँधी की तरह बाहर चला गया। अपना आविस्कार बिन बताए और बिन चाय पिए वह चला गया। उसके जाने के बाद प्रेमा और मैं फिर उन्हीं कैनवासों में खो गए।

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उसके बाद कई दिनों तक प्रद्युम्न से मुलाकात नहीं हो पाई। वह आया ही नहीं। मैं और प्रेमा ऑनेस्टी सीरीज की तसवीरों की प्रदर्शनी की तैयारी में जुट गए। तैयारी पूरी होने पर भी वह नहीं आया।

प्रदर्शनी पंद्रह दिनों तक चली। लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। यह भीड़ देखकर मन के कोने में लगता कहीं प्रद्युम्न ने कुछ किया हो। मैं पैंटिंग करने वाला एक कलाकार, विचार और भाव की उतार-चड़ाव मेरे लिए बहुत जरूरी हैं। लगता प्रद्युम्न कहीं से मुझे टेलिपैथिक मैसेज कर रहा है। पर मैं ठीकठाक कुछ कहने की स्थिति में नहीं था।

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जिस दिन प्रदर्शनी खत्म हुई उसके दूसरे दिन देश के सभी प्रमुख समाचार पत्रों की हेडलाइंस में था- 'इमान्दारिता की क्रांति' अर्तात् 'रिभोल्यूसन आव ऑनेस्टि'।

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मूल नेपाली से अनुवादः लेखक स्वयं।