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इरफान अली ? नारायण ढकाल
चोरी के आरोप में कैद इरफान अली को जब आठ नंबर कोठरी में पहुँचाए जाने की खबर आग की तरह पूरे जेल में फैल गई। "फिर तो आज कुछ बुरा होनेवाला है।" जेल के भीतर चौराहे पर बैठे एक बुढ्ढे कैदी ने कहा। "साले मुसल्टे को साढ़े सात के ग्रह दशा थे क्या ?" दूसरा कैदी बोल उठा। दोपहर चार बजे करीब की घटना है यह। चैत्र का आखिर चल रहा था और ठंड काफी घट चुकी थी। इरफान अली ने फूलबारी के छोर से ऑलमुनियम के पुरानी देग़ची में मिट्टी उठाई और अपने कमरे की तरफ चल दिया। शायद चूल्हा बनाना चाहता था। कल ही उसे वीरगंज से महानगर के इस जेल में लाया गया था। कल चूँकी देर हो चुकी थी, उसने चौकीदारों के रसोई में ही खाया। इरफान अली चार सिढ़ी क्या चढ़ा था, कमरे के दादा दलसिं ने उसे पीछे से धर दबोचा। दलसिं की सांसे तेज चल रही थीं। इसका मतलब होता- दलसिं ने दूर से ही इरफान के इस काम को देख लिया था और उसे धर दबोचने के लिए दौड़ते हुए आया था। "साले मुसल्टे ! कोठरी चल।" दलसिं ने उसे धकियाते हुए हुक्म दिया। इरफान अली कुछ देर के लिए भौचक्का रह गया। वह कुछ समझ नहीं पाया। "अब भी नहीं समझ रहा साले ! कोठरी चल।" उसके बाद इरफान अली दलसिं के पीछे पीछे चला और आठ नंबर कोठरी में ढुक गया। राजधानी के उस जेल की आठ नंबर की कोठरी कैदियों के लिए आंतक का पर्याय थी। किसी कैदी को आठ नंबर में लाया जाना दूर्भाग्यपूर्ण घटना का सूचक था। कोई कैदी आठ नंबर से भलाचंगा नहीं निकल पाता था। पॉकेटमार से चोर, डाकू, हत्यारे या कोई राजनेता, जिसे ठीक करना हो उसे प्रशासन यहाँ आठ नंबर में भेज देता था। यहाँ लाने के बाद शारीरिक यातना का लंबा और असह्य सिलसिला चलाया जाता था। इसी कोठरी में बहुतों ने अपने जान गवाँए। यह उस जेल का सनातन और वैदिक नियम था, जबकि किसी भी कैदी को शारीरिक यातना से मार देने की बात किसी कानूनी किताब में नहीं थी। इरफान अली को मूल चौकीदार के सामने खड़ा किया गया। वह भय से थरथर काँप रहा था। "मालिक ! फूलबारी से मिट्टी चुरानेवाला मुसल्टा यही है।" "क्या यह वही है जिसे वीरगंज जेल में सांप्रदायिक दंगा होने पर यहाँ लाया गया है ?" मूल चौकीदार ने पूछा। "जी हाँ मालिक, इसे कल ही इधर लाया गया है।" दलसिं ने कहा। "अच्छा ! तो इसे उस कोने में ले जाकर बाँध दे।" यह मूल चौकीदार का आदेश था। मूल चौकीदार अपनी बीवी के कत्ल के इलज़ाम में बीस साल की सजा काट रहा था। करीब चौधह साल बीत चुके थे और वह जेल प्रशासन और व्यवस्थापन के प्रति कुछ ज्यादा ही वफ़ादार था। उसे आस लगी थी - महाराज के शुभजन्मोत्सव के दौरान आम माफी की घोषणा में शायद वह छूट जाए। यहाँ लाकर उसे इसतरह क्यों बाँधा गया है, इरफान अली समझ नहीं सका। उसे लगता था, उसने कोई गलत काम नहीं किया है। कल जब से वह यहाँ ढुका था, किसी से एक शब्द भी नहीं बोला था। एक तो नया था, ऊपर से वह सिर्फ देहाती भाषा ही बोल पाता था जिससे उसे कठिनाई हो रही थी। जब सुबह से किसी से कुछ बोला ही नहीं था तो झगड़े का सवाल ही पैदा नहीं होता था। फिर वह झगड़ालू भी नहीं था। फिर उसे इस नरक में क्यों लाया गया ? क्या अपराध है उसका ? पर उस समय मुल्क में तानाशाही का दबदबा था और किसी भी सवाल का जवाब दिया नहीं जाता था। इसलिए इरफान अली ने खुद से वह सवाल पूछा। उसे विश्वास था आत्मा में अल्लाह बसे होते हैं। कुरान तो उसने पढ़ा नहीं था। पर जिन्होंने पढ़ा था वे उन्होंने उसे यह बात बताई थी। बहुत देर तक जवाब के प्यास से तड़पते इरफान के ऊपर जब दलसिं के लात, मुक्के और डंडे बरसने लगे तो उसका चेहरा रंगहीन होने लगा। इस तरह से श्याम वर्ण के उस सज्जन मुसलमान के चेहरे की आकृति पीड़ा और भय से विकृत हो चली। "मालिक दया करी, हमर कुछो भूल नैखे।"( मालिक दया करो, मेरा कोई दोष नहीं है।) उसने कहा। "अब भी कहता है, दोष नहीं है, ए साले रंडी का बच्चा !" मूल चौकीदार बड़ी आवाज में कड़कने लगा। "जेल में आने के बाद जेल के कायदे-कानून पालन करने चाहिए या नहीं ? गधे !" मूल चौकीदार की आवाज में लय जोड़ते हुए दलसिं गरजा। आवाजों के विस्फोटों से परेशान इरफान अली ने फिर अपने आत्मा के अल्लाह से पूछा- अल्लाह मेरी क्या गलती है ? मुझे तो नहीं लगता मैंने कोई गलत काम किया है ! फिर मूल चौकीदार की तरफ मुड़कर उसने कहा- "मालिक, हमरासे जे भइल अन्जान में भइल। हमर कुछो भूल नैखे, दया करी।"( मालिक हमसे जो हुआ है अनजाने में हुआ है, इसमें मेरा दोष नहीं है, दया करो !") उसकी नरममिजाजी चौकीदार को पिघला नहीं सकी। उसका दिल मोम की तरह नरम भी नहीं था। अगर दयावान होता तो मूल चौकीदार का पद कैसे पाता ? क्योंकि जेल के अलिखित विधान के तहत मूल चौकीदार का पद ऐसे व्यक्ति को दिया जाता जो अत्यंत क्रूर और कुटिल हो। उसपर उपत्यका के दूसरे जेल नख्खु में झापा आन्दोलन के राजबंदी पैंतालिस मिटर लंबी सुरंग खोदकर फरार हो गए तब से गृह मंत्रालय ने जेल प्रशासनों को और ज्यादा तानाशाही दिखाने का आदेश दे दिया था। इसी के तहत जेल के भीतर किसी को भी मिट्टी खोदने की इजाजत नहीं थी। काम चाहे जो हो। सेंट्रल जेल के सभी कैदी इस बात को जानते थे, जानता नहीं था तो सिर्फ इरफान अली। "लो सुनो ! इसे इतने कड़े कानून को तोड़ने की हिम्मत कैसे आ गई ?" मूल चौकीदार समझ नहीं पा रहा था कि माजरा क्या है। "यह भी अराष्ट्रीय तत्वों का ही एक अंग होगा, मालिक ! नहीं तो कैसे जोखिम मोल ले सकता है ?" दलसिं ने अपने बॉस के हाँ में हाँ मिलाया। वक़्त गुजरता गया। आठ नंबर कोठरी में सोनेवाले मूल चौकीदार के साथी अपने अपने कामों से लौट पड़े। अब तो उस सुरंग जैसे लंबी कोठरी में करीब एक दर्जन शासक कैदी उपस्थित थे। फिर शुरू हुआ जंगली यातना का दौर। वहाँ प्रदर्शित बर्बरता की दृश्यावली कोई भी भला आदमी देख नहीं सकता था। सबसे पहले इरफान अली पर एक मटका पानी उड़ेला गया। फिर उसके गीले बाल पकड़कर मुंह में मुक्के बरसाए गए। मुंह से खून की नदी बह गई और इरफान ने असह्य पीड़ा से तड़पते हुए प्रार्थना की- "हमर कुछ भूल नैखे, दया करी।"(मेरी भूल नहीं है, क्षमा करें।) पर इरफान अली की यह प्रार्थना किसी ने नहीं सुनी। जब लगभग आधा घंटा उत्पीड़न का यह सिलसिला जारी रहा तो घृणा और आक्रोश से भरे स्वर में इरफान ने जेल प्रशासन के आदमियों की तरफ देखते हुए कहा- "हाय अल्लाह ! शैतान के हाथ से हम असहाय की रक्षा करो।" इस गाली को मूल चौकीदार ने अच्छी तरह से सुना। खुद को शैतान कहे जाने से उसका गुस्सा सातवें आसमान पहुँच गया था। "क्या कहा ? किसको कहा तुने शैतान ? रंडी का बच्चा। तुम लोगों ने सुना इसने क्या कहा ? अब मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि यह अराष्ट्रीय तत्व ही है। यह सामान्य कैदी हो ही नहीं सकता।" "मालिक ने ठीक फरमाया। अगर ऐसा न होता तो इसे क्यों यहाँ लाया जाता।" यह आवाज दलसिं की थी। "हाँ रे ! यह तो बहुत बुरा हुआ....।" "अब तुमलोग ही बताओ, यह जेल जेल की तरह नहीं रहे तो, कैसे चलेगी व्यवस्था ? फिर व्यवस्था को कुछ हुआ तो...........?" "जी , ठीक फरमाया मालिक !" अपनी सेना के तीनचार जन एक साथ बोल उठे। इरफान अली के पिछले संवाद के बाद वे सब अपनी अपनी दृष्टि से उसके जीवन- चरित्र के बारे में सोचने लगे और अपने विवेक और ज्ञान के आधार पर विचार करने लगे। उधर इरफान का शरीर लहूलुहान हो गया था। "बोल ओए मुसल्टे ! तू कौन से उग्रवादी संगठन का सदस्य है ? कौन से एंबेसी से पैसे लेता है ?" मूल चौकीदार अपनी खटिया से उठा और इरफान की तरफ बढ़ा। इरफान ने मूल चौकीदार के सवाल का जवाब नहीं दिया। पहली बात यह सवाल ही उसके लिए किसी एब्सट्रैक्ट आर्ट की तरह क्लिष्ट था। दूसरी बात लगातार की पिटाई से वह इस तरह क्लांत हो गया था कि आवाज उसके जीभ से बहुत दूर जा चुकी थी। जेल के अलिखित विधान के अनुसार यातना का दूसरा दौर आरंभ हुआ। सामान्य शिक्षादीक्षा से जिस कैदी को सुधारा नहीं जा सकता था, उसे दूसरे दौर से गुजारा जाता था। इस दौर में, नाख़ूनों में पीन चुभोना, पैर के तलवे में गरम लोहे के डंडे मारना और उलटा लटकाने की क्रिया संपन्न होती थी। दूसरे दौर के आंरभ से ही इरफान के मुँह से ऐसी आवाजें, ऐसे चीत्कार निकलने लगे, जिसे वही सुन सकते थे जिसके पास मनुष्य का दिल न हो। इस बार आठ नंबर की कोठरी से निकली आवाजें और चीत्कार उस कोठरी के दीवार लांघ कर दूसरी कोठरियों तक पहुँची। उसके बाद इरफान अली बेहोश हो गया। अनंत समय के लिए। जेल के नियम में खाना खाने का समय छे बजे के पहले था। जेल के आंतरिक प्रशासन को भी इसी नियम के तहत चलना होता था। इसलिए वे सब इरफान के रस्सी से बंधे शरीर को वैसा ही छोड़ खाना खाने के लिए रसोई की तरफ बढ़े। रसोई में भी खाने से ज्यादा उसी अभागे कैदी के मिट्टी खोदने की बात को लेकर हर किस्म के व्याख्यान और तर्क पेश किए गए। शाम सात बजे के समाचार का वक़्त हुआ। जेल के सारे कैदी अपने-अपने कमरों से जेल के बीचों-बीच बने विश्रामागार में समाचार सुनने आ गए। पर किसी के कान रेडियो से प्रसारित समाचारों पर नहीं थे। उनके लिए इरफान अली ही सबसे महत्त्वपूर्ण समाचार बना हुआ था। "अभागा मुसल्टे ! मिट्टी खोदने से आगे हमसे पूछा होता कमसे कम। इस झमेले में तो नहीं पड़ता।" समाचार सुनने के बहाने खड़े एक कैदी ने दूसरे कैदी से कहा। "वो साला कपटी रहा होगा। कम से कम किसी से दोस्ती तो कर ही सकता था।" तीसरा बोल उठा। "यहाँ आने के बाद से ही उदास दिखता था। जेल आने के बाद घरबार बरबाद हो जाने का गम था शायद।" चौथे ने दुःख प्रकट किया। समाचार खत्म होने पर सब अपने अपने कमरे की तरफ चल दिए। बाहर शहर में कोलाहल कम नहीं हुआ था। फिर भी वह जेल शांत भाव से सोए हुए अजगर के समान दिखता था। बाद में सिर्फ पहरेदार की आवाज 'खबरदार' 'खबरदार' गूंजती रही। उधर आठ नंबर की कोठरी अपने अमानवीय और गलत करतूतों के लिए सक्रिय थी। ये सब दिखा रहे थे- तात्कालिक नेपाल का प्रतिबिंब कहाँ है। राजधानी के जेल का वह कमरा एक सबूत आईना था जिसपर पूरे नेपाल की छवि देखी जा सकती थी। जहाँ पूरे देश का अत्याचार और अन्याय देखा जा सकता था। इरफान अली के ऊपर हुए अत्याचार भी तो पूरे देश में हो रहे अत्याचार के बोंसाई रूप थे। रात के दश बजे मूल चौकीदार और उसकी सेना शराब के नशे में धुत्त थे। पूरे जेल में यही एक समूह था जिसे शराब पीने की छूट थी। उसी समय आगे-पीछे बंदूकधारी गार्डों के साथ जेलर आ पहुँचा। सामान्यतः जेलर ऐसे ही समय में जेल की कोठरियों में आता था। आते ही उसने कहा- "क्या खबर है ?" "एकदम ठीक, हुजुर !" मूल चौकीदार बोला। "शिक्षा-दीक्षा ग्रहण किया या नहीं इस अधम ने ?" जेलर ने फिर पूछा। "शिक्षादीक्षा क्या हुजुर, इसे तो पूरी मुक्ति ही मिल गई।" मूल चौकीदार की बात थी। आंतरिक प्रशासन के कैदियों का उत्साह बढ़ाकर जेलर वहाँ से चलदिया। इरफान के बदन से कपड़े उतारे गए। इसी बीच मूल चौकीदार ने दलसिं से कहा-"ओए दले, देख तो, यह असली मुसलमान है या नकली !" "मालिक ! कैसे पता लगाएँ ?" "गधे ! इतना भी नहीं जानता, यदि यह सच्चा मुसलमान हो तो इस के गुप्तांग की चमड़ी कटी हुई मिलेगी।" उसके बाद मूल चौकीदार ने ठहाका लगाया। उस ठहाके को संकेत मानकर उस कोठरी के सभी कैदियों ने अट्टहास किया। रात के ग्यारह बजे नंगे इरफान अली को उलट-पुलट किया गया। उसकी सांस और दिल का पता करने के लिए दलसिं ने विभिन्न अंगो पर चोट किया। शायद शराब के नशे से उसे मालूम नहीं पड़ा वहाँ जीवन है या मौत। लेकिन कुछ देर बाद मालूम पड़ा- उसका शरीर कहीं भी गरम नहीं है, उसका बदन बर्फ में तब्दील हो गया था। "यह तो मर गया मालिक।" बहुत देर की खोज के बाद दलसिं ने कहा। उसके बाद जेल के नियमानुसार उसके मृत देह को जेल के बाहर हस्पताल जे जाया गया। यह वो हस्पताल था जहाँ हत्या को सहज दूर्घटना करार दे कर प्रमाणपत्र लिखा जाता। इरफान के मामले में भी कुछ नया नहीं हुआ। दूसरे दिन- दूसरे दिन सबेरे सूरज की रोशनी अच्छी नहीं थी। जेल के ऊपर का आकाश उदास काले बादलों ने ढक दिया था। बारह बजे के करीब सब कैदी सामान लेने की जगह जमा हुए। तब मूल चौकीदार सभी कैदियों को संबोधन करते हुए कहने लगा- "सुनो कैदियों ! जेल के भीतर जो नियम नहीं मानते, उन्हें इरफान अली मुसलमान की तरह मौत को स्वीकारना होगा। इसलिए मैं तुम्हें कहता हूँ, कोई भी वैसा नीच काम न करे। सरकार ने सबको दो जून की रोटी दी है, बीमार होने पर दवादारू भी की है। तुम्हें तकलीफ न हो इसलिए हर साल बजट बढ़ाया भी गया है। इसलिए तुम सबको सरकार की जय करनी होगी। सरकार से पंगा लेनेवाले को देशद्रोही, उग्रवादी या अराष्ट्रीय तत्व कहते हैं। तुम सबलोग समझे कि नहीं मैं जो कह रहा हूँ ?" "समझ गए, मालिक !" स्कूल के बच्चों की तरह सब कैदी एक ही आवाज में चिल्लाए। साथ ही उनकी आँखों से आँसू के छोटे-छोटे बूंद नीचे लुढ़क पड़े।
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मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी। |