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सज़ा --मनु मन्जिल तुमने दिल दहला देनेवाली डाँट पिलाई मेरे घर की खिड़कियां गिराने के लिए पत्थर मारे और तुम चले गए मैंने उसी वक्त तुम्हारे लिए एक सज़ा सोच ली।
वाद में एकबार तुम मिले तुम तुषार की ठंड से ऐसे कांप रहे थे जैस टूट पड़ोगे फिर एकबार मिले तुम वैशाख की चिलचिलाती धूप में जल रहे थे। फिर दूसरीबार तुम चढाई में मिले तुम दुःख का पहा़ड़ चढ़ रहे थे और फिर एकबार देउराली में तुम मिले तुम आंसुओं की तरह नी.......चे नी.....चे बह रहे थे।
कभी खुद से भागकर तुम शहर के संकरी गलियों में भागते मिले कभी सपने बेच दिवालिया बन यूं ही आवारा घूमते मिले ईश्वर को चढ़ाने के खातिर एक फूल उगाने के लिए अपनी ज़मीन न होने के झोंक में गोद के बच्चे के लिए एक हरी पत्ती न होने के झोंक में तुम जुलूस में आवाज बुलंद करते हुए मिले।
गए साल ही तो जिंदगी के ऊस छोर तक राज्यद्वारा खदेड़े जा रहे मिले वाद में विद्रोहियों से भी खदेड़े जा रहे मिले जहां तुम मिले दुःख से रूह तक भीगे मिले जिंदगी दुःखती, पग-पग में काटों से बिंधे मिले।
सच, इस समय, इस परिवेश में तुम्हें जिंदा छोड़ देने के सिवा बड़ी सजा और क्या हो सकती है मैं बेवकूफ तुम्हारे लिए सज़ा सोच रहा था।
मूल नेपाली से रूपांतरः कुमुद अधिकारी
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