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एकांत

--मनु ब्राजाकी

वह रो भी नहीं रहा, हंस भी नहीं रहा। हंसने की तो कोई बात ही नहीं है। भीतर कमरे मे बेटा मर रहा है। सायद मर चूका है। उसको कुछ भी नहीं मालूम। पूरे घर में भीड़ जमा है। औरत विलाप कर रही है। वह बाहर आंगन में पाजन के लट्ठे में बैठा है। एक बार रोने की कोशिश की। पर नहीं रो पाया। हंसने की कोशिश करने पर चेहरे की चमड़ी में सिलवटें दिखाई दी लगा था गीता पाठ करूं सोच रहा था वह पर कर नहीं पाया। तीन बार पेसाब करने कि कोशिश की। लगा छाती में कुछ जम सा गया है। खांसकर देखा तो कुछ नहीं निकला मुंह से।

"बच्चे का बाप कौन है जी ?"

"संसार ऐसा ही है, चिंता न करें। काल की अपनी गति होती है।"

"बाहन निकालना नहीं है क्या ?"

"ओए, भीड़ ज्यादा हो गई ?"

"यार शंभु ! उस लड़की को जानता है ?"

"वह तो बम पटाखा है, च्यान्टे !"

"वह विलाप करनेवाली भी तो मजे की है।"

"ओए चुप चुप !"

नियम से तो रोना चाहिए था। आंखों में पानी तो लाना चाहिए था। ऐसा न होने पर जोर से हंसने पर भी संताप से पागल हो गया कहते लोग। वह नीचे की भीड़ को चीर कर ऊपर आ गया। जाने अनजाने लोगों का समूह भी उसी के साथ ऊपर चढ़ा।

"मौत तो अजेय है।" लगा कहीं कोई घोषणा कर रहा है।

"बेचारा ! कितनी कम उम्र में काल ने उसे छिन लिया।"

वह सिगरेट सुलगाकर उनलोगों की तरफ देखने लगा। ऐसी स्थिति में क्या कहना चाहिए उसे मालूम नहीं। वह ललाट पोंछने लगा। फिर उसे लगा एकबार पेसाब करने चला जाए। वे अभी भी गुमसुम बैठे थे। क्या कहूं, क्या कहूं कहते कहते वह कह गया- "मैं ठीक हूं।"

"मैं ठीक हूं।" उसने शिष्टतापूर्वक कहा। जो सामने बैठै थे वे चौंक गए पर ऐसे जमे रहे जैसे लड़की पटाने बैठे हों।

"देखिए न ! मैंने भी पुत्र बियोग सहा है। पिछले साल मेरा बेटा........।"

"मैं रो तो नहीं रहा।"

सभी एक-दूसरे की तरफ देखने लगे।

"आपलोगों के लिए चाय बनाऊं क्या ?" उन्हें अचानक सांप सूंघ गया। चौंककर एक-दूसरे की ताकने लगे।

"देखिए हमलोग दुःख प्रकट करने आए........"

"आपलोगों ने दुःख प्रकट कर लिया, और मैंने ग्रहण भी कर लिया। और कितना देना चाह रहे हैं ?"

उसने सिगरेट का गहरा कश लिया और जामुन के पेड़ की तरफ देखने लगा। यह जामुन का पेड़ उन्हीं सज्जन का है जिसके पास उसके बेटे के लिए अनगिनत गालियां थीं  और उतने ही थप्पड़ भी थे। उनलोगों के निरर्थक औपचारिकताओं ने कोई दुःख तो नहीं पहुंचाया था पर परेशानी हो रही थी। सुखदुःख में शायद यही हो। यह सोचकर वह व्यङ्ग्यपूर्वक हंसने की कोशिश करने लगा। सोच में निरसता छा रही थी। एकबार तो उसे भी लगा बीवी की तरह दहाड़े मारकर रोए। ऐसा करने पर यहां उपस्थित लोग शायद ज्यादा दया और करूणा प्रकट करें लेकिन ऐसा करना घृणास्पद लगता है। ऐसे स्थिति की कल्पना से वह और परेशान हो गया। वे कुछ देर तक उसे घेरे रहे और उस कमरे की तरफ चल दिए जिधर उसका बेटा मर रहा था।

वह फिर नीचे उतरक पाजन के लट्ठे पर बैठ गया। कुछ देर बाद डॉक्टर बाहर आया। उसके कन्धे पर हाथ रख कहने लगा- "मैंने कोशिश तो बहुत की। धैर्य रखें।" डॉक्टर निकलने के तुरंत बाद कंपाउंडर निकला एक दवाईयों का बैग लटकाकर। कुछ देर खड़ा रहा और उसके हाथ में कागज का एक टुकड़ा थमा दिया। भीतर बीवी का मातम और जोर पकड़ रहा था। उसने कागज खोलकर देखा, रात और दिन करके चार बार डॉक्टर साहब की फीस बीस चौका अस्सी रूपये, चार बार कंपाउंडर का इंजेक्शन फीस दो चौका आठ रूपये। कुल जमा अठासी रूपये। भीतर रंग उड़े बक्से में उसके पुराने और शादी क पहले की प्रेंम प्रशंगों की लंबी चिट्ठियों के अलावा कुछ फटे पुराने कपड़े हैं। अभी उसके जेब में है- आठ रूपये पैंतीस पैसे, एक पेंसिल का टुकड़ा, पॉकेट डायरी, और एक आशा सिगरेट का डिब्बा। कंपाउंडर कुछ देर खड़ा रहता है और फिर चलने लग- "मैं अभी चलता हूं। धैर्य करें।"

धैर्य करने के कारण ही वह रो नहीं सका है। सहानुभूति प्रकट करनेवालों ने धैर्य क इतने पुलिंदे थमा दिए हैं कि उन्हे रखने की जगह नहीं मिल रही है। भीतर कमरे में अधैर्य की बाढ़ है। पड़ोसी रामेश्वर प्रसाद की बीवी गौरी की हिचकियां बाहर स्पष्ट सुनाई दे रही हैं। वही गौरी जिसको पटाने के सिलसिले में रामेश्वर से वाकयुद्ध हो गया था

लाल बहादुर धामी(ओझा) हात की राख झाड़ते हुए बाहर आता है। लट्ठे के एक छोर पर बैठकर चिलम में गांजा भरने लगता है। चुनाव में वोट न देने की वजह से अपने कुए से पानी न देनेवाले और स्कूल से उसके बेटे को निकलवाने वाले शङ्करदेव भी धैर्य धारण का उपदेश देकर रास्ता नाप चुके हैं। रास्ता चलते लोग भीतर आ रहे हैं। भीड़ बड़ रही है। उसकी परेशानी भी बड़ जाती है। पाजन के लट्ठे पर बैठकर वह चार सिगरेट फूंक चूका है। फिर भी पेसाब नहीं लग रहा, पेसाब भी आंसूओं की तरह सुख गया है। चारों तरफ से, 'हाय !', 'च्च....च्च...', 'बेचारा !', 'हाय राम !'  जैसी आवाजें उसे घेरकर असहयोग के खोह की तरफ धकेल रही हैं।

मास्टर देवलाल का आगमन हुआ है। "बहुत परिश्रमी छात्र था।"

"था।"

ईस छोटे से उत्तर से देवलाल चौंक पड़ता है। क्योंकि ऐसा करने पर भी उसने मातम नहीं मनाया। शङ्करदेव के साथ मिलकर उसी ने तो उसके बेटे को स्कूल से निकाला था। फि भी सामाजिक औपचारिकता तो है ही। फिर बोल उठता है- "सच कहूं , गणित में तो ऐसा चालाख छात्र मैंने जीवनभर नहीं देखा।"

"क्यों घबराते हैं मास्टर साहब, धैर्य करना सीखिए।" ऐसा कहने पर उसे लगता है कि अपने ऊपर थोपी गई खोखली सहानुभूतियों को वह थोड़ा कम कर पाया है। देवलाल कुछ नहीं बोल और चुपचाप लाल बहादुर धामी से चिलम लेकर पीने लग

भीड़ भीतर से बाहर तुलसी की झाडियों के पास आ गई है। बीवी को तीनचार लोग पकड़कर लाए हैं।

"मेरे बाबू ! मेरे राजा !.......प्राण निकलने के वक्त भी मेरी किताब कहां है?, कहते थे....मेरे राजा....!"

"बास लाए ?"

"लाए हैं।"

"खुकुरी कहां है,....जल्दी...।"

रामेश्वर की पत्‍नी खुद को पतिव्रता सिद्ध करती हुई कहने लगी- "देखा, ब्राह्मणी को लात मारने का अन्जाम !"

"चुप हो जा ! क्यों चिल्ला रही है ?" रामेश्वर आंखें तरेरकर कहता है।

जब वह ऊठकर जाने लगता है तो रामेश्वर कह उठता है- "किधर जा रहे हैं ?"

वह चुपचाप बाहर निकल जाता है। संडास में घुसकर कुछ देर यूंही कुछ देखता रहता है। वहां की शांति ने उसे भीतर तक खोलकर उसे हलका कर दिया है। एकांत का मदानी जब विगत को मथने लगता है तो वह अचानक पैर के बल बैठकर भावविह्वल हो रोने लग जाता है।

 

मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी।