नेपाल की पहली हिन्दी वेब पत्रिकाः हिन्दी साहित्य सरिताः साहित्य की अविरल धारा
वर्ष–2
जुलाई-2008
अंक- 14
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हिन्दी साहित्य सरिता के इस अंक में प्रस्तुत है
समुन्द्रा शर्मा की कविता कैसे कहूँ
काँच की चूड़ियाँ तो
पलभर में टूट जाएँगी
कैसे कहूँ मैं इन चूड़ियों में
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डॉ.रवीन्द्र समीर की लघुकथा बूँद "दोस्त कुआँ, प्रचंड गर्मी है, मैं सूखी जा रही हूँ मुझे शरण........
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